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सैनिकों के साथ भिखारियों जैसा व्यवहार नहीं करे सरकार: कोर्ट

सैनिकों के साथ भिखारियों जैसा व्यवहार नहीं करे सरकार: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने वेतन और पेंशन के मामले में सेना कर्मियों के साथ भिखारियों सा सुलूक किए जाने के लिए केन्द्र सरकार को लताड़ा और कहा कि देश की सीमाओं की हिफाजत करने वाले जांबाजों के प्रति अधिक मानवीय रवैया अपनाए।

न्यायालय ने इस मामले में तल्ख लहजे में कहा कि अगर कोई व्यक्ति दिल्ली के किसी हिस्से में भीख मांगे तो वह हर दिन एक हजार रूपए कमा लेगा और आप एक ऐसे व्यक्ति को एक हजार रूपया महीना दे रहे हैं, जिसने ऊंचाई वाले इलाकों में देश के लिए अपनी जान की बाजी लगाई और जिसकी बांह कट गई।  न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू और एके पटनायक की पीठ ने एक फैसले के दौरान मौखिक टिप्पणी में कहा कि उन बहादुर सैनिकों के साथ सुलूक करने का क्या आपका यही तरीका है।

शीर्ष न्यायालय ने केन्द्र की एक अपील पर यह फैसला सुनाया। केन्द्र ने अपनी अपील में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एक शार्ट कमीशंड अधिकारी सीएस सिद्धू को अधिक पेंशन देने का निर्देश दिया गया था। नवंबर 1970 में पहाड़ी इलाके में डयूटी के दौरान एक दुर्घटना के कारण सिद्धू की दाईं बांह काटनी पड़ी थी।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सेना कर्मी बहादुरी से देश की हिफाजत करते हैं और अपनी जान की बाजी तक लगा देते हैं। हमारा मानना है कि सरकारी अधिकारियों द्वारा उनके साथ बेहतर और अधिक मानवीय सुलूक किया जाना चाहिए। खास तौर से जब बात उनकी परिलब्धियों, पेंशन अथवा अन्य लाभ की हो।

अदालत में उस समय नाटकीय स्थिति पैदा हो गई, जब अतिरिक्त सालिसिटर जनरल पराग त्रिपाठी ने न्यायालय से आग्रह किया कि वह आदेश में भिखारी, कंजूस, दयनीय जैसे कठोर शब्दों का इस्तेमाल न करें। इसके बाद पीठ ने इन शब्दों को आदेश से हटा दिया।
   
न्यायालय ने कहा कि हमें अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि सेना के अधिकारियों और जवानों के साथ हमारे देश में सरकार द्वारा बहुत दीन-हीन सा व्यवहार किया जाता है। इस मामले में प्रतिवादी (सिद्धू), जिन्हें एक पहाड़ी इलाके में तैनात किया गया था, अपने कर्तव्य पालन के दौरान दुर्घटना का शिकार हो गए और उन्हें नाममात्र (करीब एक हजार रूपए महीना) जमा डीए की पेंशन दी गई। न्यायालय ने अपने लिखित आदेश में कहा कि अगर आपका अपने सेनाकर्मियों से व्यवहार करने का यही तरीका है तो यही कहा जा सकता है कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।

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