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आंखों में पलनेवाले सपने को मरने नहीं दिया रजिया ने

अपने जीवन की तमाम तंगियों के बावजूद अपनी आंखों में बड़े सपने लिए रजिया सुलतान ने इंजीनियर बनने का उद्देश्य निर्धारित कर रखा था। जीवन में अक्सर आनेवाली आर्थिक परेशानियों के कारण परिस्थितियों से लड़ने की उसकी आदत बन गयी, लेकिन उससे उसका हौसला बढ़ता ही गया। अंतत: हिन्दुस्तान कोचिंग स्कॉलरशिप ने उसे नई राह दिखाई है। बोकारो के आजाद नगर में रजिया सुलतान अपनी मम्मी-पापा और भाई-बहनों के साथ रहती है। पापा असलम अंसारी एचएलसीएल में कार्यरत थे। मम्मी गुलाम निशां गृहिणी हैं। एचएससीएल की बदहाली के कारण पापा की आमदनी अनियमित हो गई थी। स्कूल में फीस और किताब-कॉपी का बोझ वह बड़ी मुश्किल से उठा पाते थे। लेकिन रजिया की मम्मी हमेशा अपने बच्चों का हौसला बढ़ाती रहीं। पापा 1998 में रिटायर हो गए। जो भी पैसा मिला, बड़ी बहनों की शादी में खर्च हो गए। आय के सीमित साधन में ही पापा ने एक टैक्सी खरीद ली। उससे घर का खर्चा चलने लगा। मम्मी सिलाई करके मदद करती रही। बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान रखा और उनका हौसला बढ़ाया। पापा-मम्मी ने कभी रजिया की हिम्मत को टूटने नहीं दिया। बोकारो पब्लिक स्कूल में 11वीं कक्षा की छात्रा रजिया बताती है कि उसने मैट्रिक तक कभी ट्यूशन नहीं किया। उसे सेल्फ स्टडी पर भरोसा है। हिन्दुस्तान कोचिंग स्कॉलरशिप ने उसे नया जीवन दिया। पहली बार हिन्दुस्तान कोचिंग स्कॉलरशिप का फॉर्म निकला, तो जीजी के कहने पर फॉर्म भर दिया। फिर वह सफल भी हो गई। बकौल रजिया, हिन्दुस्तान ने उसे जो रास्ता दिखाया है, उसके लिए वह अखबार की शुक्रगुजार है।

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