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वकीलों की दलील

वकील से राजनेता बने महात्मा गांधी ने आज से सौ साल पहले ‘हिंद स्वराज’ में कहा था कि वकील समाज में अशांति और विवाद चाहते हैं, ताकि उनका व्यवसाय चलता रहे। आज ‘हिंद स्वराज’ के शताब्दी समारोह के मौके पर दंड प्रक्रिया संहिता में हुए मामूली संशोधन के खिलाफ देश भर के वकीलों ने दो हफ्ते में तीन बार हड़ताल कर गांधी की बात को फिर प्रासंगिक कर दिया है। सीआरपीसी की धारा 41 और 30में हुए जिस मामूली संशोधन पर वकीलों ने जमीन-आसमान एक कर रखा है उसका महा इतना ही अभिप्राय है कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं करेगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उस अपराध पर कानूनी कारवाई नहीं होगी। पुलिस उस अभियुक्त को अदालत में हाजिर होने का नोटिस दे आएगी और अगर वह व्यक्ित उसका पालन नहीं करता या अदालत उसकी सफाई से संतुष्ट नहीं होती तो उसके जेल जाने का विकल्प खुला हुआ है। वैसे भी कानून में किसी नागरिक को गिरफ्तार करने का उद्देश्य सिर्फ इतना बताया गया है कि कानूनी प्रक्रिया को सुचारु रूप से चलाने के लिए अभियुक्त की मौजूदगी सुनिश्चित की जा सके। अगर बिना गिरफ्तार किए वह उद्देश्य पूरा हो रहा है तो उसकी जरूरत नहीं बताई गई है। लेकिन हड़ताल पर जा रहे वकीलों का कहना है कि इससे अपराधियों में कानून का डर ही खत्म हो जाएगा और समाज में अपराधों की बाढ़ आ जाएगी। पर उनकी यह बात विधिशास्त्र के सुधारात्मक अथवा मानवाधिकारवादी किसी भी सिद्धांत से मेल नहीं खाती। वकीलों की इस दलील का एक अर्थ यह भी निकलता है कि हमारा कानून अपराधियों को सजा के अंजाम तक ले नहीं जा पाता, इसलिए गिरफ्तारी ही अपने में सजा है। पर यह तो कानून के सिद्धांत के और भी खिलाफ है। तो क्या वकीलों के इस विरोध के पीछे उस कथित और अव्यक्त चिंता को सही माना जाए कि गिरफ्तारी कम होने से जमानत के मामले घट जाएंगे और इससे अधिवक्ता समुदाय के व्यवसाय पर असर पड़ेगा? कई वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि यह आशंका भी निराधार है। क्योंकि अभियुक्त अदालत तो फिर भी आएगा और मुकदमा भी उस पर चलेगा ही। इसलिए नागरिक अधिकारों के पक्ष में हुए इस संशोधन के विरोध में वकीलों को अपनी यह दलील छोड़ कर सुधार का स्वागत करना चाहिए।

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  • Web Title: वकीलों की दलील