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जीवन की प्रकृति के कवि

अभी हाल में मुझे एक ऐसी कविता पढ़ने को मिली, जिसे मैंने कई मित्रों को सुनाया। ‘जानते हैं वही’ शीर्षक यह कविता ‘परिचय’ में छपी है। इस स्तंभ के पाठकों को भी वह कविता पढ़ा देना चाहती हूं- ‘हवा की पेड़ की पत्ती की भाषा जानते हैं वही। झींगुर का चूहों का गिलहरी का संगीत जानते हैं वही। हत्यारों का अपराधियों का निरपराध का मनोानते हैं वही काटी है जिन्होंने सजा।’ कवि हैं-लीलाधर मंडलोई। भयावह एकांत में, जेल में रातें गुजार बगैर प्रकृति के इस संगीत को नहीं सुना जा सकता। हवा, पेड़, पत्ती, झींगुर, चूहे और गिलहरी का संगीत वही सुन सकता है, जिसे प्रकृति के संगीत को एकांत में सुनने का अवसर हो। और साथ ही जो प्रकृतिजीवी भी हो। ‘मगर एक आवाज’, ‘काल बांका तिरछा’, ‘छमा याचना’ और ‘देखा-अदेखा’ संग्रह की अनेक कविताएं भी लीलाधर मंडलोई के प्रकृतिजीवी होने का सबूत देती हैं। समुद्री हवाओं में उड़ते नमक, सघन वन की निस्तब्धता और आदिम जनजातियों के संगीत ने मंडलोई के काव्य को ऐसी लयात्मकता दी है, जहां जीवन राग की गूंज सुनी जा सकती है। जंगल, खदान, समुद्र, बारहसिंहा, हिरण, पहाड़, नदी के दृश्य बिम्ब उनकी कविता को नया ताप और नई पहचान देते हैं। भूगोल, वन्य जीवों, वनस्पतियों और अंडमान की आदिम जनजातियों के व्यापक संसार से कवि की संवेदना और सरोकार इस तरह जुड़ते हैं कि कविता एक नया आशय हासिल कर ले। ‘जहां एक चींटी भी अपदस्थ कर सकती है ईश्वर को’ क्योंकि ईश्वर के भरोसे कवि यह दुनिया नहीं छोड़ सकता। कवि धरती के बार में जितना सोचता है, उतना ही आकाश के बार में भी। मंडलोई की नजर में सूर्य डूबता नहीं, अस्तु पहाड़ पर आरूढ़ होता है। एक कविता में वे कहते हैं- ‘रोशनी के उतरते झरने मेंमैंने उस रो अपना अंधकार देखा।’ मंडलोई ने समुद्र पर कई कविताएं लिखी हैं। मुझे तो लगता है कि कवि के अंदर भी एक समंदर है। उसने उसे बचाकर रखा है- ‘हम गाते हैंसमुद्र की प्रार्थनाएंकि सलामत रहे समुद्र।’ समुद्र और उसके अनोखे जीव-संसार को और आदिम जनजातियों के उपेक्षित जीवन की विकल कर देनेवाली अभिव्यक्ित मंडलोई ने अपनी कविताओं में की है। यह समय बहुत खूंखार है और इसके आक्रमण में सबसे ज्यादा आहत प्रकृति और स्त्री ही हुई है। प्रकृति के प्रति मंडलोई का ललकभरा प्रेम उनकी कविताओं में अंतरंग संबद्धता के साथ उभरा है। मेरी राय में तो लीलाधर मंडलोई प्रकृत जीवन और जीवन प्रकृति के कवि हैं। जो कुछ भी सुंदर व जीने योग्य है, वहां पड़ती है उनकी कवि दृष्टि। मंडलोई की स्त्री विषयक कविताएं बेहद तात्पर्यपूर्ण हैं। उन कविताओं में मातृत्व का जो भाव है, मेरी राय में उसका मान सबसे बढ़कर है। मनुष्य से लेकर वन्य जीवों व वनस्पतियों पर लिखी उनकी कविताएं जीवन छाया की स्वरलिपि सरीखी हैं। सघन संवेदना से भरी ये कविताएं जीवन की विविध रंगों, प्रतिच्छवियां इस तरह प्रस्तुत करती हैं कि कविता को जीवन से अलगाया ही नहीं जा सकता। दोनों जसे काया और छाया की भांति हों। सूक्ष्म ऐंद्रिक अनुभूति के बूते मंडलोई परंपरा की समृद्धि और आधुनिकता के वैविध्य दोनों को जोड़नेवाली एक राह की निर्मित करते हैं। मंडलोई की कविताएं जितना हमार भीतर का द्वार खोलती हैं, उतनी ही बाहर का भी। उनके काव्य में बाहरी ही नहीं भीतरी आंच है। यह आंच ही जीवन को ताप देती है, जूझने की ताकत देती है। तमस से संग्राम का साहस देती है। शोक में सांत्वना देती है। सुभाष मुखोपाध्याय से लेकर वीरन्द्र नाथ चक्रवर्ती का मानना है कि महान कविता वह है, जो हमार सुख का समर्थन कर, संग्राम को साहस दे और शोक में सांत्वना दे। इस कसौटी पर मंडलोई की अनेक कविताएं खरी उतरती हैं। कदाचित् इसीलिए हिंदी कविता की समृद्ध परंपरा के वे ऐसे हिस्सेदार हैं, जिनके बगैर समकालीन हिंदी कविता की मुकम्मल तस्वीर नहीं बन सकती। समकालीन हिंदी कविता का अद्यतन रूप और चरित्र बनानेवालों में मंडलोई भी हैं। कविता के अलावा गद्य विधा को भी उन्होंने साधिकार स्पर्श किया है। मेर सामने एक कविता है ‘दिल का किस्सा’। जिसे निबंध, लेख, रिपोर्ताज, संस्मरण और यात्रा वृत्तांत का कोलाज कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। अन्य निबंधों के अलावा अंडमान की अंतरंग यात्राएं, समुद्र, कालापानी, मृत्यु की कगार पर दुर्लभ जनजाति और ‘जारवा’ अत्यंत मर्मस्पर्शी हैं। मंडलोई की एक और किताब का शीर्षक ही है- ‘काला पानी।’ उसमें कविता और लेखमालाओं के जरिए अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के समुद्र, वन्य जीवन और वहां के मंगोल व नेग्रिटो मूल की दुर्लभ जनजातियों पर उनकी रचनाएं साहित्यिक कृति की वनिस्पत समाजशास्त्रीय अध्ययन ज्यादा हैं। अंडमान के आश्चर्य लोक से रू-ब-रू होने के लिए इन रचनाओं से गुजरना ही होगा। गद्य-पद्य में सृजन के समानांतर मंडलोई ने संपादन भी किया है। सुदीप बनर्जी की अप्रकाशित कविताओं की किताब अभी-अभी उन्होंने तैयार की हैं। ‘कवि एकादश’ उनकी सुसंपादित पुस्तक है। संपादन भी सृजन का सुख दे सकता है, इसे मंडलोई की संपादित पुस्तकें साबित करती हैं।

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