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राजरंग

पानी पिलाने का पुण्य साहब सबसे बड़ी पंचायत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठते हैं। उनके बायें-दायें बड़े-बड़े रसूखवाले बैठते रहे हैं। फिलहाल पंचायत बैठ नहीं रही है। इसलिए काम-धाम कुछ हो नहीं रहा है। ले-देकर टाइम पास हो रहा है। साहब जिस कुर्सी पर बैठते हैं, पानी तो किसी को पिलाते नहीं हैं। उलटे बहुत लोग उनको ही पानी पिलाते रहा है। इसलिए फुर्सत के वक्त सोचे कि पब्लिक को ही पानी पिलाने का इंतजाम करते हैं। पानी की जरूरत तो साल भर रहती है। गरमी के मौसम में कुछ खास। पानी पिलाना तो पुण्य का काम है। चापाकल, कुआं और तालाब से पहले भी पानी पिलाते रहे हैं। अब जनता को शुद्ध पानी पिलाने की जुगत में जुटे हैं। जनता को पानी पिलायेंगे। इसके एवज में जनता पानी का मूल्य चुकायेगी। इसे कहते हैं आम का आम गुठली का दाम। सच कहिये तो एसी योजना सबको सोचनी चाहिए। पैसा तो खर्च हो जायेगा, लेकिन पैसे का सदुपयोग हो तो क्या कहने? वैसे भी आनेवाले दिनों में पानी का विश्वव्यापी संकट होनेवाला है। इस संकट से उबारना ही दूरदर्शियों का काम है। फिर एसे दूरदर्शी सब हों, तो जनता को काहे का कष्ट?

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