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बस चाहिए ठोस इरादा और नीयत

ाब व्यवस्थाएँ ही साफ-सुथरी नहीं हैं तो परीक्षा कैसे पाक-साफ होगी? तो क्या यूपी बोर्ड की परीक्षाएँ नकलविहीन नहीं हो सकतीं? एक बड़ा मौन..एक बड़ा सवाल। ‘हिन्दुस्तान फोरम’ में जब नकल के तल्ख पहलुओं को छेड़ा गया तो पैनलिस्ट घूम-फिर कर इसी एक मूल बात पर आकर अटक जाते, लेकिन इस एक बात पर सभी सहमत थे कि नकल के इस दानव को यूँ ही नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए किसी ने यूपी बोर्ड की कार्य संस्कृति में आमूलचूल बदलाव की जरूरत जताई तो कोई वित्तविहीन स्कूलों पर लगाम कसने का पैरोकार था।ड्ढr फर्ाी स्कूलों पर कसे लगामड्ढr चर्चा में फर्ाी स्कूलों पर जमकर प्रहार हुए। एक नया आँकड़ा सामने आया। दरअसल शहर में लगभग साढ़े तीन हाार फर्ाी विद्यालय हैं। अभी तक साढ़े चार सौ स्कूलों की ही बात होती रही है। ये स्कूल शिक्षा विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। इनमें बिना मान्यता के हाईस्कूल व इण्टर की कक्षाएँ चलती हैं। फेल छात्रों को पास कराने का ठेका उठता है। माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश मंत्री डॉ.आर.पी. मिश्रा कहते हैं कि पंजीकरण से नकल माफिया का खेल शुरू होता है। वे छात्रों को बिना मान्यता वाले अपने स्कूलों में पढ़ाते हैं और उनका पंजीकरण दूसरे विद्यालयों से कराते हैं। वहीं से बोर्ड परीक्षा फार्म भरवाते हैं। यह स्कूलों के साथ साँठ-गाँठ करके छात्रों को पास कराने का ठेका लेते हैं। स्ववित्त पोषित विद्यालय प्रबंधक महासंघ के महासचिव संतराम सिंह चौहान भी इस तथ्य से सहमत हैं। वह कहते हैं कि शुरुआत जुलाई महीने में दाखिले से ही हो जाती है। जुलाई आया नहीं कि शिक्षा माफिया सक्रिय। वे कोचिंग संस्थानों के छात्रों का पंजीकरण कराते हैं। अगर पंजीकरण व परीक्षा फार्म भरवाते समय इन पर अंकुश लगा दिया जाए तो परीक्षा काफी हद साफ-सुथरी हो जाएगी।ड्ढr साफ-सुथरी छवि के विद्यालय बनें परीक्षा केन्दड्र्ढr साफ-सुथरी छवि के विद्यालय अगर परीक्षा केन्द्र बनाए जाएँ तो नकल की गुंजाइश कम हो सकती है। माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष और एमएलसी ओमप्रकाश शर्मा का मानना है कि राजकीय व वित्त पोषित विद्यालयों को परीक्षा केन्द्र बनाने में वरीयता मिलनी चाहिए। इन स्कूलों के शिक्षक जवाबदेह हो सकते हैं। वित्त विहीन स्कूलों के शिक्षक तो विभाग के नहीं अपने प्रबंधक के प्रति वफादार होते हैं। उन पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता है। माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश मंत्री डॉ. आर.पी मिश्रा हालाँकि स्वच्छ छवि वाले वित्त विहीन विद्यालयों को परीक्षा केन्द्र बनाने के खिलाफ नहीं हैं। उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. जेपी मिश्रा भी आर.पी. मिश्र की सोच का समर्थन करते हैं। वह कहते हैं कि वित्त विहीन स्कूलों के शिक्षक उसी के प्रति वफादार होते हैं जो उन्हें नौकरी देता है। उनकी नौकरी प्रबंधक के रहमोकरम पर चलती है। ऐसे में वह वही करते हैं जो मालिक कहता है। वित्त पोषित कॉलेजों के शिक्षक पूरी तरह सरकारी कर्मचारी होते हैं। इन पर कार्रवाई का अधिकार विभाग के पास रहता है। जेपी मिश्र कहते हैं कि स्कूलों की बिल्डिंग नकल नहीं कराती। नकल टीचर कराते हैं। लिहाजा बिल्डिंग को डिबार करने की बजाय उन शिक्षकों व प्रधानाचार्यो को डिबार किया जाए जिनके रहते नकल हुई।ड्ढr कक्ष निरीक्षकों व केन्द्र व्यवस्थापकों की छवि भी देखेंड्ढr कक्ष निरीक्षक व केन्द्र व्यवस्थापक परीक्षा की रीढ़ होते हैं। साफ-सुथरी परीक्षा के लिए कक्ष निरीक्षकों की छवि का साफ-सुथरा होना बहुत जरूरी है। केन्द्र व्यवस्थापक अगर चाह ले तो किसी भी केन्द्र पर नकल नहीं हो सकती। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफसर व शोआ फातिमा पब्लिक स्कूल के प्रबंधक शारिब रुदौलवी कहते हैं कि स्कूल प्रशासन अगर चाह ले तो नकल हो ही नहीं सकती। फिर किसी कक्ष निरीक्षक व शिक्षक की क्या मजाल जो नकल करा ले। लेकिन अगर स्कूल खुद ही नकल कराने पर तुल जाए तो कोई कुछ नहीं कर सकता है। परीक्षा कक्ष में भले ही एक कक्ष निरीक्षक रहे लेकिन उस पर नजर रखने के लिए कुछ और निरीक्षक होने चाहिए। जो थोड़ी-थोड़ी देर में कमरों का निरीक्षण कर शिक्षक व बच्चों पर नजर रखें। उनकी इस बात से सार पैनलिस्ट एक स्वर से सहमत थे।ड्ढr सही हाथों में हो प्रश्नपत्रों का रख रखावड्ढr बोर्ड परीक्षा में प्रश्नपत्रों का रखरखाव सही तरीके से होना चाहिए। सही हाथों में प्रश्नपत्र नहीं होंगे तो उन्हें लीक होने से भला कौन रोक पाएगा। ओम प्रकाश शर्मा कहते हैं कि प्रश्न-पत्र की पवित्रता तभी सुरक्षित रहेगी जब उसका रखरखाव सही हाथों में होगा। जिनको जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है उन्हें प्रश्नपत्र कैसे सौंप दिया जाता है? वित्त विहीन विद्यालयों में उनका प्रबंधक ही सव्रेसर्वा होता है। उस पर विभाग का नियंत्रण नहीं होता अगर वह प्रश्नपत्र रखेगा तो इसकी पवित्रता कैसे सुरक्षित रहेगी। छोटी-छोटी गलियों में बने प्राइवेट स्कूलों के प्रधानाध्यापकों को प्रश्नपत्र दे दिया जाता है। यह प्रश्नपत्र विद्यालयों में नहीं प्रबंधक के घर में रखे जाते हैं। जहाँ से इन्हें लीक कराया जाता है। उनकी इस बात से कोई पैनलिस्ट असहमत नहीं था।ड्ढr एक सीट पर कई-कई छात्र, फिर कैसे रुकेगी ताकझाँकड्ढr शासन ने परीक्षा केन्द्र निर्धारण के लिए भवन का मानक तय कर रखा है। लेकिन आज परीक्षा हाल में एक-एक सीट पर ठूँस-ठूँस कर छात्र बैठाए जाते हैं। माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश शर्मा कहते हैं कि 20 गुणा 25 के कमरे में अगर तीस से ज्यादा छात्र बैठाएँगे तो वे नकल तो करेंगे ही। एक सीट पर एक छात्र को बैठाकर परीक्षा दिलाने की आदर्श परम्परा कहाँ बिला गई?ड्ढr जिस विषय की परीक्षा होड्ढr उस विषय के शिक्षक रहेंड्ढr परीक्षा से दूरड्ढr जिस दिन जिस विषय की परीक्षा हो उस दिन उस विषय के शिक्षक की परीक्षा कक्ष में डय़ूटी नहीं लगनी चाहिए। क्योंकि सम्बंधित शिक्षक उस विषय का विशेषज्ञ होता है। वह प्रलोभन में आकर नकल करा सकता है, लेकिन दूसरे विषय का शिक्षक अगर कक्ष निरीक्षक होगा तो वह चाहकर भी छात्रों को नकल नहीं करा सकेगा। क्योंकि उसे सम्बंधित विषय की नॉलेज ही नहीं होगी। एमएलसी ओम प्रकाश शर्मा कहते हैं कि शासन के इस बारे में स्पष्ट आदेश भी हैं। लेकिन शिक्षा माफिया के इशारे पर फिािक्स के टीचर का परिचय पत्र केमेस्ट्री का बना दिया जाता है और उससे फिािक्स के पेपर के दिन कक्ष निरीक्षक की डय़ूटी कराई जाती है। परिचय पत्र में होने वाली इस धाँधली को रोका जाना चाहिए। एसकेडी एकेडमी के 12 वीं के छात्र व हाईस्कूल के टॉपर दीपेन्द्र सिंह भी कक्ष निरीक्षकों पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं कि अगर शिक्षक खुद नकल कराए तो छात्र क्या करे।ड्ढr स्कूल व शिक्षक का सहयोगड्ढr भी जरूरीड्ढr नकल रोकना अकेले किसी अधिकारी के बस की बात नहीं है। इसके लिए शिक्षक, छात्र व स्कूल प्रशासन तीनों को मिलकर प्रयास करना होगा। डीआईओएस गणेश कुमार कहते हैं कि प्रधानाचार्य व शिक्षक हमारे हैण्ड होते हैं। उनके सहयोग के बिना हम अकेले कुछ नहीं कर सकते। अधिकारी आदेश दे सकता है। व्यवस्थाएँ दुरुस्त करा सकता है लेकिन परीक्षा कक्ष में खड़े होकर डय़ूटी नहीं कर सकता। श्री कुमार कहते हैं कि विद्यालयों में अगर पठन-पाठन दुरुस्त हो तो छात्रों को नकल करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

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