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मंदी और रोचागार

लोबलाक्षेशन, विश्व बाजार, खुला संसार ये सारी बाते अचानक ही थम सी गई हैं। मंदी के गहराते ही इनकी वकालत करने वाले दुनिया भर के अमीर देश अब यह जतलाने पर तुले हुए हैं जसे यह सब सुख में सुमिरन करने वाली चीजें थीं। दुख आते ही वे उन संरक्षणवादी तौर तरीकों को अपनाने की बात कहने लगे हैं जिनको लेकर कभी गरीब देश फटकारे जाते थे। कार्यवाहक वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने पश्चिमी देशों के संरक्षणवाद पर जो खरी-खरी बाते कहीं हैं, उन्हें इसी संदर्भ में देखना होगा। अभी कुछ ही साल पहले तक विकासशील देशों को इस बात के लिए जमकर कोसा जाता था कि वे दुनिया भर के उत्पादों, उद्योगों और कंपनियों के लिए अपने दरवाजे बंद रखते हैं। उन्हें यह कहां सिखाया जाता था कि अगर दरवाजे खुलेंगे तो आधुनिक उत्पादों और बाजार की आधुनिक स्पर्धा के साथ ही विकास भी उनके यहां पहुंचेगा। कुछ विश्व व्यापार संगठन की कोशिशों से और कुछ बदलती दुनिया के असर से ये दरवाजे खुल गए। और विकासशील देशों के वे वहम भी गलत साबित हुए हैं कि विकसित देशों की कंपनियां उनके बाजार, व्यापार और अर्थव्यवस्था को पूरी तरह निगल जाएंगी। उत्पादों के साथ ही एक और मांग भी रही है कि श्रमिकों की निर्बाध आवाजाही के लिए भी दुनिया भर के देशों को अपने दरवाजे खोल देने चाहिए, लेकिन विकसित देश कभी इसके लिए पूर मन से तैयार नहीं हुए। मजबूरी में अमेरिका ने एच-1बी वीज़्ाा जसी कुछ छोटी-मोटी खिड़कियां जरूर खोलीं, इसके आगे कुछ नहीं हुआ। एक दूसरी बात यह जरूर हुई कि सस्ते और कुशल श्रम के चक्कर में आउटसोर्सिग का चलन शुरू हुआ और कई रोगार विकासशील देशों में चले आए। अब जब मंदी आई है तो ये खिड़कियां भी बंद की जा रही हैं। तर्क यहां तक है कि विदेशियों को रोगार देने वाली कंपनियों को आर्थिक मदद ही न दी जाए। यह कुछ वैसा ही है कि जसे आर्थिक संकट के कारण कोई विकासशील देश विदेशी कंपनियों को अलविदा कह दे, और अपने दरवाजे बंद कर दे। आर्थिक मंदी जिन भी कारणों से आई हो वह पूरी दुनिया पर असर दिखा रही है और आखिर में पूरी दुनिया को मिलकर ही इससे जूझना होगा। हमार लोग, तुम्हार लोग, हमारी कंपनी, तुम्हारी कंपनी करते हुए हम कोई हल तो नहीं निकाल पाएंगे। हां, अपनी परशानियां कई गुना बढ़ा लेंगे।ं

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