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12 दिसंबर, 2019|7:34|IST

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दक्षिण भारत में महिला आरक्षण की होड़

राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर हुई चर्चा में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखने के पक्ष और विपक्ष में वही चिरपरिचित तर्क दोहराये गए। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल तो हमेशा से इसके विरोध में थे लेकिन तृणमूल कांग्रेस पार्टी का उनके साथ अचानक शामिल हो जाना आश्चर्यजनक था।

पहले हम इस मुद्दे पर दक्षिणी राज्यों की प्रतिक्रिया देखें। समाजवादी पार्टी और राजद सदस्यों के शोरगुल और हंगामे के मुकाबले दक्षिण भारत शांत रहा। इसकी वजह यह है कि ओबीसी और मुस्लिमों को मिलाकर महिला आरक्षण वहां मौजूद है। इसे पिछले कई दशकों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है और इससे कोई सामाजिक और राजनैतिक बवाल भी नहीं हुआ।

दरअसल, दक्षिणी राज्यों में विभिन्न पार्टियों और नेताओं में इस मुद्दे पर आगे रहने की एक अघोषित प्रतिस्पर्धा रही है। पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल सेकुलर अध्यक्ष एच डी देवेगौड़ा ने तुरंत इस विधेयक के मूल निर्माता होने का दावा पेश कर दिया।

उन्होंने खुशी जाहिर की कि उनके प्रधानमंत्रित्व के दौरान जो विधेयक बना था उसे बिना किसी बदलाव के राज्यसभा ने मंजूर कर लिया। उन्होंने कहा कि उन्हें बड़ी परेशानी होती थी जब चुनाव में महिला उम्मीदवारों को टिकट देने की उनकी कोशिशों को उनकी ही पार्टी के नेता जीतने की संभावना के आधार पर निरस्त कर देते थे।

इसलिए जब वे कर्नाटक के मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने स्थानीय और पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 33 प्रतिशत कर दिया, इन संस्थाओं के अध्यक्ष के पदों और सरकारी नौकरियों और शिक्षा में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करवाया। मुसलमानों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण दिया और स्कूल और कॉलेजों में शिक्षकों के 50 प्रतिशत महिलाओं के आरक्षित कर दिए। इसी प्रयोग से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी महिला आरक्षण लागू करने की उन्हें प्रेरणा मिली।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन बाद राज्य में वार्षिक बजट पेश करते हुए कहा कि पंचायती राज संस्थाओं के जरिए महिलाएं ग्रामीण विकास में उत्साह के साथ भागीदारी कर रही हैं और उन्होंने घोषणा की कि सारी स्तरों पर महिलाओं के लिए आरक्षण 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है।

तमिलनाडु में पिछड़ावर्ग की महिलाओं को मिलाकर महिला आरक्षण लगातार बढ़ाया गया है। आज स्थिति यह है कि दोनों प्रमुख द्रविड़ पार्टियों में उम्मीदवारों के चयन के वक्त पिछड़े वर्ग की महिलाओं की स्थिति सबसे ज्यादा मजबूत होती है।

अपने राज्य में महिला आरक्षण को आसानी से लागू होते देखने के बाद मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि आरक्षण में आरक्षण पर संसद हो रही बहस से अप्रभावित है। उनकी टिप्पणी थी ‘हम इसे बाद में तय कर सकते हैं कि इस फल के अलग-अलग हिस्से कौन खाएगा। आरक्षण एक समूचे फल की तरह है। फिलहाल हम इस बात पर खुश हों कि हमने इसे पा लिया है।’

आंध्र प्रदेश में महिलाओं को अपना हिस्सा तब मिला जब 80 के दशक की शुरुआत में तेलुगु देशम पार्टी सत्ता में आई। टीडीपी के सत्ता की ओर ऐतिहासिक अभियान के आगे-आगे महिलाएं थी और पार्टी अध्यक्ष व मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव ने उन्हें भरपूर सम्मान दिया। उनके उत्तराधिकारी चंद्रबाबू नायडू ने राज्य सभा में इस बिल पास हो जाने का स्वागत किया लेकिन सरकार से आग्रह किया कि वह विभिन्न पार्टियों के उठाए सवालों का भी समाधान करे।

मुख्यमंत्री रोसैया ने पार्टी और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राज्यसभा में इस विधेयक के सफलतापूर्वक पास हो जाने पर बधाई दी। उन्होंने इसे ‘भारतीय महिलाओं की जीत’ बताया और कहा कि महिला आरक्षण विधेयक की सफलता ने उन्हें भारत के आजादी पाने पर हुई खुशी की याद दिला दी। केरल चूंकि एक मातृसत्तात्मक राज्य है इसलिए वहां सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी को लेकर कभी कोई समस्या नहीं हुई।

इसके बावजूद एलडीएफ सरकार ने इस मौके पर याद दिलाया कि राजनीति में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण देने के मामले में वह अव्वल रही है। आगामी स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में 50 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी होगी ऐसा वाममोर्चे के नेताओं को विश्वास है।

इन क्षेत्रों से समर्थन के बावजूद भाजपा और कांग्रेस में यह डर है कि मुस्लिम और पिछड़ी महिलाओं के लिए अलग कोटे की समाजवादी पार्टी और राजद की मांग से उन्हें चुनाव में खतरा हो सकता है। कांग्रेस के लिए यह खतरा ज्यादा है क्योंकि उसके जनाधार में इन दोनों समूहों का काफी वजन है। इसी वोट बैंक की वजह से ममता बनर्जी ने अपना रुख पलटा है। क्योंकि अगले साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव है।

radha.viswanath@gmail.com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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