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20 नबम्बर, 2019|11:59|IST

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मुक्केबाजी की चमक

दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ बॉक्सिंग चैंपियनशिप में छह भारतीय मुक्केबाज फाइनल में पहुंचे और छहों ने स्वर्ण पदक जीता। यह भी दावे से कहा जा सकता है कि इनके अलावा भी भारत में कई मुक्केबाज हैं जो इस स्तर पर पदक जीत सकते हैं, जो कई वजहों से इस प्रतियोगिता में नहीं खेले।

कुल जमा भारत में मुक्केबाजी तरक्की कर रही है और विश्व स्तर पर भारत इस खेल में एक ताकत बन चुका है। हम नहीं कह सकते कि मुक्केबाजी की तरक्की के लिए हमारे यहां बहुत अच्छी सुविधाएं हैं, लेकिन जैसा भी ढांचा है उसमें अच्छे खिलाड़ी आगे आ रहे हैं और ढांचा भी सुधर रहा है।

अच्छे प्रदर्शन की वजह से देश में इस खेल की लोकप्रियता बढ़ी और चूंकि  यह खेल अब जनता की नजर में आया इसलिए इसमें सरकारी और निजी स्तर पर सुधार की कोशिशें भी ज्यादा हुईं। दिल्ली के तालकटोरा मैदान में इस प्रतियोगिता का आयोजन भी कोई आदर्श स्थितियों में नहीं हुआ लेकिन इसके बावजूद हजारों दर्शक खेल देखने पहुंचे।

अगर अच्छा प्रचार हो, दर्शकों के लिए सुविधाएं हों तो इसे कितना दर्शकों का समर्थन मिलेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। निजी क्षेत्र की दिलचस्पी होने से भी आयोजन में कुछ पेशेवराना सफाई और चुस्ती आई है। और हम उम्मीद कर सकते हैं कि भारत में मुक्केबाजी की स्थिति और भी बेहतर होगी।

पिछले दिनों यह बात गलत सिद्ध हुई है कि क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों में पैसा और लोगों की दिलचस्पी नहीं है। चाहे हॉकी वर्ल्ड कप हो या यह बॉक्सिंग चैंपियनशिप, जाहिर यही होता है कि खेलों में लोगों का समर्थन भी है और पैसा भी, सिर्फ उसे सही दिशा देने और व्यवस्थित करने की जरूरत है। खेलमंत्री एमएस गिल ने एक इंटरव्यू में बताया कि अब भी विश्व हॉकी का आधा पैसा भारत से आता है।

अगर भारत में हॉकी प्रशासन बेहतर हो जाए, नेताओं और अफसरों की सिर फुटव्वल खत्म हो जाए, तो यह पैसा कई गुना हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग फेडरेशन ने जो पेशेवर लीग शुरू करने की योजना बनाई है, उसके भी केंद्र में भारत है। हम सोच सकते हैं कि जब यह पेशेवर लीग लोकप्रिय होगी और मुक्केबाजों को क्रिकेटरों की तरह लाख या करोड़ रुपए के अनुबंध मिलेंगे तो कितने नौजवान इस खेल की ओर आकर्षित होंगे।

हमें चाहिए कि जो उत्साह और समर्थन भारतीय जनता से इन खेलों को मिल रहा है उसका रचनात्मक उपयोग करें। भारत में कई खेलों की इतनी लोकप्रियता तो है ही कि औद्योगिक घराने सिर्फ सदाशयता की वजह से नहीं, शुद्ध व्यापारिक वजहों से इनमें पैसा लगाएं। निजी क्षेत्र के आने से सुविधाएं भी आती हैं, और उनका बेहतर इस्तेमाल भी होता है। लेकिन सबसे बड़ी ताकत जनता की दिलचस्पी है।

आज क्रिकेट का प्रशासन दूसरे खेलों से बेहतर इसलिए है कि जनता की इस खेल में दिलचस्पी है ओर इसकी वजह से कुछ जवाबदेही खेल प्रशासकों की बन जाती है। मुक्केबाजी में दिलचस्पी पिछले ओलंपिक में भारत के अच्छे प्रदर्शन से शुरू हुई। इसके बाद एशियन चैंपियनशिप, विश्व चैंपियनशिप और अब कॉमनवेल्थ में अच्छे प्रदर्शन ने मुक्केबाजी और भारतीय दर्शकों के बीच संबंध को मजबूत किया है और इसके बेहतर नतीजे निकलेंगे।

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