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22 नवंबर, 2019|3:17|IST

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अच्छा हुआ आज गांधी नहीं हैं

अखबार और टेलीविजन माध्यम में आज क्रिकेट, क्राइम और सैक्स की खबरों को प्रधानता दी जा रही है। सुवह से लेकर देर रात तक टीवी पर अपराध, खेल और फूहड़ किस्म की खबरों से टीवी स्क्रीन को सजाया जा रहा है। एक ओर राखी का स्वयंवर तो दूसरी ओर राहुल महाजन का आडंबर। बॉलीवुड हस्तियों को तो ऐसे पेश किया जा रहा है मानो वह जनमानस के भगवान हों। सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरों से आज यह माध्यम किनारा करते जा रहे हैं। दर्शकों की अभिरूचि पर आधारित पत्रकारिता की जा रही है। अखबारों को प्राय: प्रत्येक वर्ग का सच्चे मित्र के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन आज मुख्य पृष्ठ से लेकर अंतिम पृष्ठ तक खून-खराबे, दंगे-फसाद, किसी का ब्रेकअप तो किसी का अफेयर, तू-तू, मैं-मैं दिखाकर पेजों को भरा जा रहा है। आम व्यक्ति से जुड़ी खबरों को स्थान ही नहीं बचा है। टीवी पर तो हद ही पार हो रही है। कुछ न्यूज चैनल छोटी सी बात को बढ़ा-चढाकर खबर को सनसनीखेज बना देते हैं। क्रिकेट की खबर पर हाल ही में एक चैनल कहता है कि टीवी छोड़ा तो पछताओगे। जिंदगी के अमूल्य 5 मिनिट हमें दे दो। एक ही खबर को बार-बार घुमा-फिराकर, तोड़-मरोड़कर टीवी चैनल आगे निकलने की होड़ में लगे हैं। अच्छा हुआ आज गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी, तिलक, भारतेंदु नहीं हैं, वरना उन्हें भी सफेदपोशी की आड़ में यहां चल रहे गोरखधंधे को देखना पड़ता।
रोहित मिश्र, सागर, मध्य प्रदेश

समाजवाद का दुरुपयोग
समाजवाद तो अत्यंत सुनीत राजनीतिक अवधारणा है, जिसके लागू होने से भारतीय नागरिकों की मूलभूत समस्याओं का समाधान अवश्य हो जाएगा किन्तु भारत देश में इस शब्द का काफी दुरुपयोग हो रहा है। एक तरफ भारत के संविधान का स्वरूप समाजवादी होने के बावजूद देश में समाजवाद लागू नहीं है तो दूसरी तरफ विभिन्न राजनीतिक दल अपने को समाजवादी सिद्धांतों पर चलने का झूठा दंभ भरते हैं। बढ़ता परिवारवाद और नेताओं के रहन-सहन का स्तर किस समाजवाद की कहानी कह रहा है?
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद यादव, जिला : आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

महिलाओं की भागीदारी
राज्यसभा में पास किये गये महिला आरक्षण विधेयक की महिमा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष में ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है। लोकसभा में 181 सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किये जाने से महिलाओं के लिए नये अवसर उत्पन्न होंगे। राजनीति में विराजमान औरतों और पुरुष नेताओं की संबंधी महिलाओं के लिए राजनीति का मार्ग सुगम हो जाएगा। इससे संविधानिक अधिकारों को कानूनी रूप से अमलीजामा पहनाने में महिला प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी होगी।
युगल किशोर शर्मा, फरीदाबाद

वादे और बजट
पिछले महीने सरकार ने देश का वार्षिक बजट पेश किया। जो प्रत्येक वर्ष की ही तरह जनता के हित में नहीं था। एक बार फिर बजट में राजकोषीय घाटा बढ़ा है। हमारे राजनीतिज्ञ कभी अपने वादे पर अडिग नहीं रहते। चुनाव के वक्त भोली जनता से कई वादे किए जाते है लेकिन पूरे कभी नहीं किए जाते। मंहगाई काबू करने को सरकार वादा करती है लेकिन कुछ समय बाद वादा काफूर को जाता है। सरकार देश की विकास दर को बढ़ाने में नाकामयाब रही है। क्योंकि उसकी नीतियां बूढ़ी हो चुकी है।
कुणाल कपूर

रामदेव की पार्टी
वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था इतनी भ्रष्ट हो चुकी है जिसके परिणामस्वरूप, एक सामान्य व्यक्ति इस प्रक्रिया से अपने आपको दूर ही रखना बेहतर समझता है। आज शायद ही कोई युवा किसी राजनेता को आपना आदर्श मानता होगा। इस व्यवस्था की ऐसी दशा के लिए जनता भी काफी हद तक जिम्मेदार है। लोग आपने अधिकारों के लिए चिंतित और व्यथित दिखते हैं मगर,अपने कर्तव्यों के प्रति उनका रवैया लापरवाहियों से युक्त होता है। बाबा रामदेव की राजनैतिक पार्टी के निर्माण की उनकी घोषणा एक आशा की किरण की तरह है जिसके आने से भारतीय राजनीति मे सुधार की उम्मीद को बल मिलेगा। आलोचना करने वाले इसकी आलोचना भी करेंगे।
अंकुर शुक्ला, शकरपुर, दिल्ली

हमले का अर्थ
अभी तक हमलावारों का निशाना सीआरपीएफ के जवानों पर होता था परंतु भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) पर नाकाम हमले से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि आंतकवादियों की नजरों में अब अनुसंधान करने वाले संस्थान भी इनसे अछूते नहीं रहे। हांलाकि माननीय गृहमंत्री जी ने यही कहा है कि यह नौसिखियों द्वारा किया गया हमला है। लेकिन कहीं न कहीं इन नौसिखियों के पीछे किसी आंतकवादी संगठन का हाथ लगता है। अत: हमारे देश की गुप्तचर एजेंसियों को इस बात का जल्दी से जल्दी पता लगाना होगा कि इसके पीछे कौन लोग हैं। कहीं ऐसा तो नहीं इसरो पर हमला करना उनका छलावा मात्र हो वास्तविकता में उनका निशाना कोई अन्य संगठन, अथवा महत्वपूर्ण व्यक्ति हो।
मनोज शुक्ला ‘स्वरूप’

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