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14 दिसंबर, 2019|1:52|IST

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सटीक बिल का बेवजह विरोध

मान लीजिए आप किसी रेस्तरां में खाना खाकर बीमार पड़ जाते हैं तो आप किस पर मुकदमा करेंगे? उसे रेस्तरां और उसके रसोइये पर या फिर उस सब्जी वाले पर जिसने रेस्तरां को खराब सब्जी सप्लाई की थी। निश्चित रूप से आप पहला तरीका अपनाएंगे और सब्जी वाले से रेस्तरां चाहे तो खुद निपटे।

सिविल लाइबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज बिल पर भाजपा और वामपंथी दलों का रवैया कुछ इसी तरह का है। वे चाहते हैं कि परमाणु संयंत्र चलाने वाली कंपनी को संयंत्र, कलपुर्जे और ईंधन सप्लाई करने वालों को भी परमाणु दुर्घटना होने पर जिम्मेदार ठहराया जाए।

बेशक भारत में ऐसा कानून बनना चाहिए जिससे दुर्घटना होने पर पीड़ितों को मुआवजा दिया जा सके। भारत में इस समय 18 परमाणु संयंत्र काम कर रहे हैं लेकिन अभी भी वह न तो सिविल लाइबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज पर 1963 की वियेना कनवेंशन का सदस्य है और न ही थर्ड पार्टी पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के पेरिस कनवेंशन का।

भारत के 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम में इस तरह के किसी भी उत्तरदायित्व का कोई प्रावधान नहीं है। भारत का परमाणु ऊर्जा विभाग तो दस साल पहले ही ऐसा कानून बना लेना चाहता था और तब से वह इसके कई मसौदे भी तैयार कर चुका है। नए मसौदे में दुर्घटना की स्थिति में 500 करोड़ रुपये के मुआवजे को देने का प्रावधान है। यह प्रावधान कई दूसरे देशों से बहुत ज्यादा है। चीन में यह सीमा 205 करोड़ रुपये के बराबर है, कनाडा में 335 करोड़ रुपये के बराबर, फ्रांस में यह 575 करोड़ रुपये के लगभग है।

वामपंथी दलों का विरोध अमेरिका के प्राइस एंडरसन एक्ट की गलत समझ पर आधारित है। भारत के विपरीत अमेरिका में सभी परमाणु संयंत्र निजी क्षेत्र में चल रहे हैं। भारत, फ्रांस और रूस में ऐसे संयंत्र सरकारी कंपनियां चला रही हैं। अमेरिका में संयंत्र चलाने वालों और उपकरणों की आपूर्ति करने वालों सभी ने मिलकर दस अरब डॉलर का एक साझा कोष बनाया है।

अगर कोई दुर्घटना हो जाए तो सभी पीड़ितों को मुआवज इसी कोष से दिया जाएगा। मुआवजा देने का एक जटिल फामरूला है। अब वहां पीड़ितों को मुआवजा देने की सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है। वामपंथी दलों का यह तर्क गलत है कि अमेरिका में परमाणु उत्तरदायित्व की सीमा दस अरब डॉलर है। दुर्घटना की स्थिति में वहां जो मुआवजा दिया जाएगा वह दस अरब डॉलर से कहीं कम होगा।

इसका यह अर्थ भी नहीं है कि दुर्घटना की स्थिति में खराब उपकरण की आपूर्ति करने वाला बच के निकल सकता है। मसौदे का क्लाज़ 17 उपकरण आपूर्ति करने वालों पर मुकदमे की इजाजत देता है। इसी क्लाज़ में आपूर्तिकर्ता, सर्विस प्रोवाइडर या उसके किसी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने का प्रावधान भी है। हालांकि मौजूदा बिल को आखिरी क्षणों में लोकसभा में पेश होने से रोक दिया गया लेकिन इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के सबसे बेहतर प्रावधान हैं और यह कई आधुनिक परमाणु देशों के कानूनों से बहुत बेहतर है।

भाजपा और वामपंथी दल न सिर्फ इस बिल की इसलिए आलोचना कर रहे हैं कि इसमें उपकरणों और ईंधन की सप्लाई करने वालों को बख्श दिया गया है बल्कि वे मुआवजे की 500 करोड़ रुपये की अधिकतम सीमा को भी बहुत कम बता रहे हैं।

वे यह भी मांग कर रहे हैं कि संयंत्र चलाने वाले के उत्तरदायित्व के अलावा सरकार का भी 30 करोड़ स्पेशल ड्राइंग राइट तक का उत्तरदायित्व होना चाहिए, जो मौजूदा विनिमय दरों के हिसाब से 2,087 करोड़ रुपये के आस-पास बैठता है, जिसका अर्थ होगा कि इसका भार आम भारतीय करदाताओं पर आ जाना।

वे क्लाज़ 18 के उस प्रावधान की भी आलोचना कर रहे हैं जो कहता है कि मुआवजे का दावा दुर्घटना के दस साल बाद तक ही किया जा सकता है। उनका कहना है कि यह समय सीमा काफी कम है क्योंकि ऐसी दुर्घटनाओं के बाद जैविक नुकसान के बहुत से लक्षण कई साल बाद दिखाई देने शुरू होते हैं।

लेकिन ये सारे तर्क उस वियना और पेरिस कनवेंशन के उलट हैं जिन पर 80 देशों ने दस्तखत किए हैं। हमें एक नजर इसके मूलभूत सिद्धांतों पर डालनी चाहिए। यह सिद्धांत कहते हैं कि उत्तरदायित्व मूल रूप से परमाणु संयंत्र के ऑपरेटर का होगा। ऑपरेटर का यह उत्तरदयित्व अपने आप में संपूर्ण होगा यानी गड़बड़ी कोई भी हो जिम्मेदार ऑपरेटर ही होगा। उत्तरदयित्व की एक सीमा होगी।

वियेना कनवेंशन ने न्यूनतम सीमा 50 लाख डॉलर तय की है लेकिन अधिकतम सीमा नहीं तय की। पेरिस कनवेंशन ने अधिकतम सीमा डेढ़ करोड़ स्पेशल ड्राइंग राइट तक तय की है। ये दोनों ही कनवेंशन उत्तरदायित्व की समय सीमा दस साल मानते हैं। ऑपरेटर को इसके लिए बीमा कराना होगा और उत्तरदायित्व के बराबर की सिक्योरिटी जमा करानी होगी।

अगर ऑपरेटर इतनी सिक्योरिटी जमा कराने में असफल रहता है तो बाकी की भरपाई सरकार को करनी होगी। मामले की कार्रवाई उसी क्षेत्र की अदालत में चलेगी जिस क्षेत्र में यह दुर्घटना हुई है। राष्ट्रीयता, नागरिकता और निवास की वजह से किसी पीड़ित से कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

भारत का मौजूदा बिल इस मामले में महत्वपूर्ण है कि उसमें तुरंत मुआवजा देने का प्रावधान है जो पीड़ित को लंबी मुकदमेबाजी से बचाता है यानी इस चीज में समय जाया नहीं होगा कि किसी उपकरण की किस खामी की वजह से यह दुर्घटना हुई। परमाणु संयंत्रों में हजारों उपकरण इस्तेमाल होते हैं और किसी उपकरण की वजह से दुर्घटना हुई यह तय करना हमेशा ही टेढ़ा काम होता है।

वामपंथी दलों की एक आलोचना यह है कि इस बिल को जनरल इलेक्ट्रिक और वेस्टिंग हाउस जैसी उपकरण बेचने वाली कंपनियों को फायदा पंहुचाने के लिए बनाया गया है, लेकिन बिल में किसी देश के उपकरण सप्लायर की बात कहीं नहीं है। इसके प्रावधान सभी देशों के आपूर्तिकर्ताओं पर एक जैसे लागू होते हैं।

हां इस बिल से लार्सन एंड टूब्रो, वालचंद, टाटा, जीएमआर, लेंको जैसे भारतीय उपकरण सप्लायर्स को फायदा जरूर होगा। यह बिल सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और इस पर भाजपा व वामपंथी दलों की आपत्तियां वाजिब नहीं हैं।

लेखक स्ट्रेटजिक डेवलपमेंट ग्रुप में भारत और एशिया पैसिफिक मामलों के प्रबंध निदेशक हैं।

लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।

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