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9 दिसंबर, 2019|9:25|IST

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अर्थशास्त्र की पहेली

अर्थशास्त्र एक जटिल विषय है और मुझे जरा भी समझ में नहीं आता, लेकिन अच्छी बात यह है कि इसके बावजूद एक पत्रकारोचित आत्मविश्वास के साथ मैं धड़ल्ले से अर्थशास्त्र पर लिखता रहता हूं। मेरे लिखे पर कोई बवाल नहीं होता इसका अर्थ है कि अर्थशास्त्र किसी को भी समझ में नहीं आता।

अर्थशास्त्र समझना लगभग नामुमकिन है, जैसे बाजार में जब महंगाई बढ़ती है तो बताया जाता है कि यह मुद्रास्फीति है, इसलिए इसे कम करने के लिए बाजार में नकदी कम करनी होगी। सामान्य तर्क यह कहता है कि जब चीजें महंगी हैं तो उन्हें खरीदने के लिए ज्यादा नकदी होनी चाहिए, लेकिन रिजर्व बैंक बजाय नकदी बढ़ाने के कम करने के उपाय करती है यानी एक तो चीजें महंगी ऊपर से नकदी भी कम, ऐसे में गुजारा कैसे चले।

बैंक तुरत फुरत ब्याज दरें बढ़ा देते हैं, अब महंगाई ज्यादा है इसलिए खर्च भी ज्यादा होगा, ऊपर से कर्ज की किस्त भी ज्यादा भारी हो जाती है। एक तो करेला और नीम चढ़ा यानी महंगाई की मार और ऊपर से महंगाई कम करने के उपायों की मार।

हर तरफ से मार है। एक दिन ऐसा होता है कि मंदी आ जाती है। अर्थशास्त्री बताते हैं कि इसका अर्थ यह है कि चीजें बहुत हैं लेकिन खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। मंदी जब आती है तब यह होना चाहिए कि चीजें सस्ती हों, लेकिन अनुभव तो यह है कि नहीं होतीं। यह भी होना चाहिए कि चीजें खरीदने के लिए लोगों को पैसा दिया जाए, लेकिन होता उलटा है, खरीदने का पैसा तो क्या, रोजगार के लाले पड़ने लगते हैं।

अब कहां से खरीदोगे बच्चा! यानी यहां भी मार हम जैसे लोगों को ही पड़ती है। इसलिए ही तो अर्थशास्त्र जैसे विषयों से अपना संबंध कलम घसीटने का ही है। चाहे मंदी हो या तेजी। महंगाई हो या बजट का अर्थशास्त्र। 

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