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14 नबम्बर, 2019|6:19|IST

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विदेश नीति की दृढ़ता

नए संदर्भो में उभर रही भारतीय विदेश नीति को जहां दृढ़ता की जरूरत है वहीं उसे इतना लचीला भी होना चाहिए कि वह लगातार अपना दायरा बढ़ा सके। नई दुनिया में अपनी सुरक्षा मजबूत करने और एक बड़ी ताकत के रूप में अपनी जगह बनाने के लिए ऐसा करना जरूरी है।

इसी मकसद से भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव की छह दिवसीय अमेरिका यात्रा विशेष अर्थ रखती है। इस यात्रा में उनका मुख्य जोर दोनों देशों के संबंधों को मजबूती देते हुए उसे विस्तार देना है। इसीलिए उन्होंने दोनों देशों के रणनीतिक संवाद पर वहां के तमाम अधिकारियों से कई दौर की बातचीत की है, लेकिन भारत-अमेरिका संबंधों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान नदारद रह नहीं सकते।

निरुपमा राव ने अमेरिका को आतंकवाद संबंधी भारत की चिंता बता भी दी है। उनका यह कहना मुनासिब ही है कि आतंकवाद की भड़काऊ घटनाएं लगातार यह इशारा करती हैं कि आतंकी पाकिस्तान से आए हैं। इसके बावजूद हमने बातचीत का रास्ता बंद नहीं किया है, लेकिन इसे भारत की कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। 

अमेरिका के माध्यम से दिया गया भारत का यह संदेश पाकिस्तान को जरूर पहुंचेगा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। इसी के साथ निरुपमा राव ने यह संदेश भी दिया है कि अफगानिस्तान इस इलाके की सुरक्षा में बड़ी चुनौती है, इसलिए भारत वहां से हटने को तैयार नहीं है, बल्कि वह वहां अपनी मौजूदगी घटाने के बजाय बढ़ाना चाहता है।

इस रुख को देखते हुए अमेरिका को अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत की भूमिका की सराहना करनी पड़ी है। अफगानिस्तान में बढ़ते हमलों को आधार बनाकर भारत नाटो देशों से भी वहां परिस्थितियों के सामान्य होने तक बने रहने की सिफारिश कर रहा है।

दरअसल निरुपमा राव की इस यात्रा का मकसद अमेरिका पर अफ-पाक नीति न बदलने का दबाव बनाने का प्रयास भी लगता है। क्योंकि अगर नाटो देश अफगानिस्तान को तालिबान और परोक्ष रूप से पाकिस्तान के हवाले कर वहां से चल निकले तो इस इलाके में अशांति बढ़ने से रोकी नहीं जा सकती।
  
यही वजह है कि भारत ने पिछली 26 फरवरी को काबुल में हुए हमलों को बर्बर बताते हुए अमेरिका को पाकिस्तानी मदद में सख्त जवाबदेही की सलाह दी है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मामले में अमेरिका को अपनी भावनाओं से अवगत कराने और उसके माध्यम से पाकिस्तान को संदेश देने के साथ अमेरिका से भारत अपनी निकटता कायम करने में प्रयासरत है।

हालांकि जो रणनीतिक नजदीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के समय में बनी थी उसमें अब पहले जैसी ऊष्मा नहीं है, लेकिन उसे नया आयाम देने और उसमें ताजगी पैदा करना ही दोनों देशों के हित में है। नाभिकीय समझौते के बहाने दोनों देशों के बीच उच्च प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान जरूर तेज होगा पर अभी भी भारत को उच्च प्रौद्योगिकी के निर्यात के रास्ते में तमाम ऐसी बंदिशें हैं जिन्हें अमेरिका को हटाना चाहिए।

ऐसा करने का मुखर आग्रह भी किया गया है। अमेरिका से सहयोग का प्रयास बढ़ाने का मतलब यह नहीं है कि भारत पूरी तरह उसी पर निर्भर हो जाए। जो सहयोग अमेरिका से नहीं मिल सकता वह उसके दूसरे मित्रों और अपने पुराने मित्रों से लेने में कोई हर्ज नहीं है। इसी में हमारी विदेश नीति की मजबूती है और समझदारी भी।

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