महिलाओं के प्रति दोहरे मापदंड - महिलाओं के प्रति दोहरे मापदंड DA Image
12 दिसंबर, 2019|7:33|IST

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महिलाओं के प्रति दोहरे मापदंड

सरकार जिद पर अड़ी है कि महिला आरक्षण बिल पास करवा कर रहेंगे। अच्छी बात है। सदियों से उपेक्षित नारी वर्ग को उसके अधिकार मिलने ही चाहिए इससे कौन गुरेज करेगा। इस बिल पर आम सहमति बनती नजर नहीं आ रही। राज्यसभा में तो सरकार ने जैसे तैसे बाजी मार ली पर लोकसभा में उसे नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। असल में इसका विरोध करने वाले नेताओं के हो सकते हैं कि कुछ निहित राजनैतिक स्वार्थ हों लेकिन एक बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि इस बिल के मौजूदा स्वरूप में पास हो जाने पर नेताओं के पौबारह हो जाएंगे। खुद तो चुनाव लड़ेंगे ही अपनी बीवियों तथा बेटियों के लिए भी जमीन तैयार करवा लेंगे। गरीबों को न आज कुछ मिला है और न आरक्षण लागू होने के बाद ही कुछ मिलेगा। इसलिए यदि विपक्ष यह मांग कर रहा है कि पिछड़ी तथा अनुसूचित वर्ग की महिलाओं के लिए भी विशेष प्रावधान किया जाए तो कुछ गलत नहीं है। एक तरफ कांग्रेस पार्टी महिला आरक्षण विधेयक लाकर यह प्रदर्शित करना चाहती है कि वह महिलाओं की पक्षधर है वहीं दूसरी तरफ यही पार्टी कश्मीर में उन महिलाओं की नागरिकता को समाप्त करने की हामी भर रही है जो कश्मीर के अलावा किसी दूसरे राज्य में विवाह करेगी। क्या यह महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं है?
इन्द्र सिंह धिगान, 3, रेडियो कॉलोनी, आशियाना अपार्टमेंट, किंग्जवे कैम्प, दिल्ली

दिल्ली की नजर उतारें
सीआईआई व आईएफसी की संयुक्त अध्ययन रिपोर्ट में रिहाइश के मामले में पूरे देश में दिल्ली को बिंदास बताया गया है। उधर सज रही दिल्ली, चमक रही दिल्ली, न्यूनतम मजदूरी देने में अव्वल दिल्ली, नौकरी देने में प्रथम दिल्ली। इसी प्रकार दिल्ली का सस्तापन, दिल्ली में रोजगार मेला, समय-समय पर दिल्ली की तारीफ ही दिल्ली से बाहर वालों को दिल्ली खींच लाती है और दिल्ली पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता जाता है। जरूरत है दिल्ली की नजर उतारने की।
राजेन्द्र कुमार सिंह, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्ली

तिरंगे का अपमान
सरकार की ओर से कुछ समय पहले यह घोषणा की गई थी कि सिगरेट के पैकेटों पर वैधानिक चेतावनी के साथ-साथ धूम्रपान से होने वाली बीमारियों के चित्र भी छापे जाएंगे जैसे कि बिजली के खंभों या ट्रांसफार्मरों पर खतरे का निशान बना हुआ रहता है। कुछ ऐसे ही नियम आजकल बेहद प्रचलित गुटखों और खैनी के पाउचों के बारे में भी हैं। पर इन चित्रों से अलग गुटखों के नाम आदि पर नजर डालें तो बेहद हैरत होती है कि आखिर सरकार ने उनकी बिक्री आज तक बंद क्यों नहीं की, क्यों वह मूकदर्शक बनी है। ये नाम बेहद लुभावने तो हैं ही, साथ में राष्ट्रीय प्रतीकों-पहचानों से भी जुड़े हैं। जैसे कि एक गुटखे का नाम है- ‘तिरंगा’। ये तो सरासर देश के तिरंगे के अपमान का मामला है कि उसके न पर कोई नशीला पदार्थ बेच रहा है।
विजय कुमार सिंह, गोविन्दपुरी, नई दिल्ली

डय़ूटी पर कमेंट्री
उच्चतम न्यायालय ने डय़ूटी के दौरान रेडियो पर कमेंट्री सुन रहे एक रेलवे कांस्टेबल को बर्खास्त किए जाने संबंधी फैसले को बरकरार रखकर सराहनीय काम किया है। जिस भी अधिकारी या विभाग ने डय़ूटी पर कमेंट्री सुनने वाले को सजा दी उसने हिम्मत वाला कार्य किया है, खासकर रेलवे, बैंक, इंश्योरेंस जैसे संगठन जहां यूनियनें मजबूत हैं, कर्मचारी बाकायदा टीवी लगवा कर कमेंट्री सुनते हैं। राज्य व केन्द्र सरकार के कार्यालयों में तो आलम यह है कि कुर्सी पर अपना मफलर या रूमाल रखकर और मेज पर कागज फैला कर बाबू जी अपने घर पर बिना छुट्टी लिए कमेंट्री सुनते हैं या ऑफिस के बाहर चाय के होटल पर झुंड बना कर कमेंट्री सुनते हैं। क्या ऐसी नौकरशाही के चलते भारत, चीन जैसे उद्यमशील राष्ट्रों से आगे निकल कर महाशक्ति बन सकेगा?
एस. एस. भदौरिया, बीकानेर, राजस्थान

इन पर सख्ती बरतें
मैं डेरावाल में बने एक उद्यान में जाता हूं तो देखता हूं कि कुछ लोग वहां बैठ कर खाना ख रहे होते हैं। खाना, खाना कोई बुरी बात नहीं, पर ये लोग खाने के बाद गंदे कागज एवं रद्दी वहीं फेंक देते हैं। कुछ लोग सिगरेट-बीड़ी पी कर उन्हें वहीं फेंक देते हैं। जिस कारण पर्यावरण दूषित होता है। मेरा सरकार से अनुरोध है कि वह इन उद्यानों के मालियों को सख्ती से आदेश दें कि ऐसा करने वालों को सख्ती से मना करें ताकि उद्यानों की हरियाली बनी रहे।
विमल अरोड़ा, बी-156, डेरावाल नगर, दिल्ली

पर्यावरण संरक्षण पर जोर
पर्यावरण संरक्षण पर इन दिनों  खासा जोर दिया जा रहा है जो कि उचित ही है। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से इसके लिए काफी पैसा भी खर्च किया जा रहा है। इसमें दो राय नहीं कि पर्यावरण संरक्षण में सबसे ज्यादा उपयोगी वन हैं। भरपूर प्रयास के बावजूद देश में वन क्षेत्र घट रहे हैं। वन विभाग द्वारा कागजों पर जो आंकड़े दिखाए जाते हैं, वास्तविकता कई बार उससे अलग होती है। पौधारोपण अभियान के जरिये कई लोग अपनी तिजोरियां भरने में लगे हैं। ऐसे लोगों का पर्दाफाश किया जाना चाहिए। पृथ्वी पर जीवन बचा रहे इसके लिये वनों का क्षेत्रफल घटना नहीं चाहिए।
राजेंद्र सिंह, पंचकूला

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