मासूमों के गले पड़ा गरीबी का ढोल - मासूमों के गले पड़ा गरीबी का ढोल DA Image
20 नबम्बर, 2019|1:26|IST

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मासूमों के गले पड़ा गरीबी का ढोल


जिन कन्धों पर स्कूल का बैग होना चाहिए था, वे पिता के अशक्त हो जाने पर दो वक्त का खाना जुटाने के लिए गले में ढोल-दमाऊ डाल कर गांव-गांव घूम रहे हैं। गुसैं (गांव वाले) में अभी दया और परम्पराओं को लेकर लगाव बचा हुआ है, इसलिए किसी तरह पेट भरने लायक ‘डडवार’ (भेंट) मिल जाती है। लेकिन लोक संस्कृति और कला को बचाने के नाम पर लाखों के प्रोजेक्ट चला रहे एनजीओ और सरकार का दिल इन मासूमों को देख कर नहीं पिघलता। बच्चों का वृद्ध दादा वृद्धावस्था पेंशन के लिए वर्षो से एड़िया रगड़ रहे हैं, लेकिन  कोई नहीं सुन रहा है।

यह दोनों मासूम टिहरी जिले की कीर्तिनगर ब्लाक के कंटोली गांव के रहने वाले हैं। बड़ा मंजीत दस साल का है आशीष छह का। आशीष तो अभी ठीक से ढोल तक नहीं उठा पाता। दोनों भगवान दास के बेटे हैं। छह महीने पहले तक मंजीत के दादा छोटा दास गांव के शुभ कार्यों में ढोल बजा कर परिवार पाल रहे थे। लेकिन बुढ़ापे के चलते अब ढोल नहीं उठाया जाता। मासूमों का पिता अशक्त है इसलिए गरीबी ने वक्त से पहले इनके गले में ढोल डाल दिया। गांव के प्राइमरी स्कूल में मंजीत का नाम चौथी और आशीष का पहली कक्षा में दर्ज है। जब दो वक्त का चूल्हा संकट में न हो तो दोनों स्कूल चले जाते हैं। अन्यथा हर महीने संक्राति के दिन और गांव के शुभ कार्यो में दोनों भाई ढोल-दमाऊ बजा कर घर चला रहे हैं।

मंजीत बताता है कि,  ढोल-दमाऊ बजाने की कला उन्होंने अपने दादा से सीखी है। 71 वर्ष के छोटादास बताते हैं कि, छोटे बच्चों के गले में ढोल डालना उन्हें भी अच्छा नहीं लगता पर गरीबी के कारण बच्चों से यह सब कराना पड रहा है। वे कहते हैं कि, वृद्धावस्था पेंशन लगवाने के लिए गांव के जनप्रतिनिधियों और ग्राम विकास अधिकारी से कई बार कह चुके हैं पर अब तक पेंशन नहीं मिल पाई है। कीर्तिनगर के उपजिलाधिकारी माया दत्त जोशी ने बताया कि यह मामला उनके संज्ञान मे नहीं है लेकिन जांच करने पर उक्त परिवार को विभागी योजनाओं का लाभ दिलाया जाएगा।

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