जर्मन दंपत्ति की गोद लेने के मामले में अदालती निर्देश - जर्मन दंपत्ति की गोद लेने के मामले में अदालती निर्देश DA Image
15 नबम्बर, 2019|12:06|IST

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जर्मन दंपत्ति की गोद लेने के मामले में अदालती निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स एजेन्सी (सीएआरए) को किराए पर ली गई एक भारतीय मां की कोख से जन्मे जुड़वां बच्चों को गोद लेने की एक जर्मन दंपत्ति की अपील पर एक बार के उपाय के तौर पर विचार करने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की पीठ ने सीएआरए को चार सप्ताह का समय देते हुए मानवीय आधार पर जर्मन दंपत्ति जॉन बलाज तथा उसकी पत्नी की मदद करने की संभावना तलाशने के लिए कहा है।

जर्मन दंपत्ति ने पीठ से कहा था कि उनके देश में किराए की कोख से (सरोगेसी से) जन्में बच्चों को गोद लेना दंडनीय अपराध है, इसलिए वह किसी दूसरे देश से ऐसा बच्चा गोद लेना चाहते थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीएआरए को उनकी अपील पर विचार करने का निर्देश दिया।

इससे पहले न्यायालय ने 25 फरवरी को केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की एजेंसी सीएआरए से कहा था कि वह जर्मन दंपत्ति को एक विशेष मामले के तौर पर बच्चों गोद लेने की अनुमति देने पर विचार करे।

न्यायालय ने यह आदेश केंद्र सरकार के वकील की पीठ के समक्ष दी गई इस दलील पर दिया था कि वर्तमान नियमों के अनुसार, जर्मन दंपत्ति को बच्चों गोद लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह विशेषाधिकार तब ही दिया जा सकता है जब बच्चों को उनके जैविक अभिभावक (बायोलॉजिकल पैरेन्टस) त्याग दें।

सरकार ने कहा कि वर्तमान मामले में बच्चों का जन्म किराए की कोख से हुआ और कानून में बच्चों को दूसरे देश के निवासी को गोद देने का कोई प्रावधान नहीं है। बहरहाल, जर्मन दंपत्ति की बच्चों गोद लेने की अपील पर एक विशेष मामले के तौर पर विचार करने की पेशकश की गई थी।

न्यायालय ने अपने पूर्व के आदेश में सरकार से जर्मन दंपत्ति की, बच्चे गोद लेने की पेशकश पर विचार करने के लिए कहा था क्योंकि जर्मनी में किराए की कोख से जन्में बच्चों को गोद लेना दंडनीय अपराध है। सरकार किराए की कोख से जन्में बच्चों को कोई नागरिकता या वीजा देने का इच्छुक भी नहीं है।

केंद्र ने पूर्व में दंपत्ति की बच्चों को नागरिकता देने की अपील इस आधार पर खारिज कर दी थी कि कानून किराए की कोख से जन्में बच्चों को नागरिकता देने का अधिकार नहीं देता।

जर्मन दंपत्ति ने एक भारतीय महिला मार्था इमैनुएल क्रिस्टी की कोख किराए पर ली थी। मार्था ने फरवरी 2008 को जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था। जर्मन दंपत्ति ने बच्चों के लिए भारतीय नागरिकता की मांग करते हुए दलील दी थी कि ऐसा न होने पर बच्चों को जर्मनी में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलेगी, क्योंकि जर्मनी में सरोगेसी को मान्यता नहीं है।

जर्मन दंपत्ति ने कहा था कि भारतीय नागरिकता मिलने के बाद बच्चों पासपोर्ट के हकदार होंगे और उनको जर्मनी में प्रवेश मिल सकेगा। पासपोर्ट अधिकारियों ने उनकी अपील खारिज कर दी, जिसके बाद दंपत्ति ने गुजरात उच्च न्यायालय में गुहार लगाई।

उच्च न्यायालय ने 11 नवंबर को केंद्र को यह देखते हुए नागरिकता देने का आदेश दिया कि दोनों बच्चों का जन्म एक भारतीय मां की किराए की कोख से हुआ है इसलिए वे देश की नागरिकता के हकदार हैं। तब केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील की।

केंद्र का कहना है कि नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार, गोद लेने वाले अभिभावक (कमीशनिंग पैरेंटस) जर्मन दंपत्ति हैं तो दोनों बच्चों को भारतीय नागरिक नहीं समझा जा सकता और उन्हें पासपोर्ट जारी करने का सवाल ही नहीं उठता।

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