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11 दिसंबर, 2019|8:53|IST

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नौकरी पर बाउंसर

लादेन मियां ऊंचा ऊंचा पायजामा पहने फुदकते हुए आए। चेहरा मारे खुशी के मुगल गार्डन हो रहा था। पुड़िया में एक पेड़ा मुंह में देते हुए बोले- ‘मुंह मीठा करो। गनीमत है कि तुम रिटायर हो गए।’ मैंने पेड़ा गटकते हुए कहा- ‘मौलाना, आज फिर दिमाग

की चर्खी घूम गई क्या? मुझे रिटायर हुए (वीआरएस लेकर) 25 साल हो गए।’ मौलाना बोले- ‘बात का नुक्ता पकड़ा करो। नहीं रिटायर होते तो बाइज्जत निकाल दिए गए होते। क्रिकेट का शौक तुम्हारी रग रग में विकेट जैसा गड़ा है। टीवी पर मैच देखे बिना रह नहीं सकते। लो साहब, कमेंट्री सुनी और नौकरी से क्लीन बोल्ड हो गए। अब जा कर पिच पर झाड़ लगाओ। रहे नाम अल्लाह का।’ मुझे हैरत में देखकर बोले- ‘नहीं समझे?’ न्यूजें ध्यान से जो नहीं पढ़ते। साफ लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने हामी भर ली है कि नौकरी पर कमेंट्री सुनने वाले को नौकरी से रफा दफा कर दिया जाए। खिलाड़ी करोड़ों पीटे, प्रशंसक के मुंह की रोटी भी छिन जाए। एक मामूली कांस्टेबल को बर्खास्त किया जा चुका है। अलबत्ता न्यूज में यह कहीं नहीं छपा है कि अगर कोई बड़ा अफसर अपने चैम्बर में टीवी पर मैच देखे तो क्या पेनाल्टी होगी? यानी वही कि छोटा आदमी जूता बनाए तो मोची, बड़ा बनाए तो बाटा। खुदा का शुक्र है कि रिटायर हो गया। अब मजे में टॉस से लेकर ‘मैन ऑफ द मैच’ तक मय विज्ञापनों के पूरा देखता हूं। गरीब कर्मचारी का भी जानने का मन होता है कि दक्षिण अफ्रीका तगड़ा पड़ रहा है या इंडिया। कम से कम उसे स्कोर ही बता दो। कुछ तो गरीबी दूर हो कि इंडिया जीत रहा है। सुप्रीम कोर्ट से मेरी गुजारिश है कि ‘पावर प्ले’ के चंद ओवर देखने की ही इजाजत दे दे। नौकरी तो साठ बरस तक करनी है, पर सचिन के 200 बार-बार नहीं पड़ते। बाकी अदालत की मर्जी।   

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