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12 दिसंबर, 2019|7:33|IST

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गडकरी का महामंडल

भारतीय जनता पार्टी के संविधान में संशोधन के बाद यह तो तय ही हो गया था कि अध्यक्ष नितिन गडकरी पार्टी पदाधिकारियों का महामंडल बनाएंगे और पदाधिकारियों की नई घोषणा में वैसा ही दिखाई भी पड़ रहा है। पर यह स्वरूप आडवाणी और वाजपेयी जैसे दिग्गज नेताओं की छाया से मुक्त होकर किसी नए युग में प्रवेश करने वाला है, वैसा नहीं लगता। जाहिर है जब पार्टी सत्ता में नहीं होती तो उसे ज्यादा नेताओं और पदाधिकारियों की जरूरत होती है, ताकि वह अपना खोया हुआ आधार पा सके। इसी लिहाज से भाजपा में जहां पहले 10 उपाध्यक्ष होते थे वहीं उनकी संख्या
अब 13 हो गई है। इसी प्रकार 11 सचिवों की जगह अब 16 सचिव हो गए हैं, लेकिन सबसे ज्यादा संख्या वृद्धि महासचिवों में की गई है। पहले पार्टी के महज तीन महासचिव थे लेकिन अब उनकी संख्या दस कर दी गई है। हालांकि अध्यक्ष ने पुराने तीनों महासचिवों को बरकरार रखा है। एक लिहाज से देखा जाए तो उन्होंने पुरानी टीम के आधार को बरकरार रखते हुए उस पर नई संरचना की सजावट खड़ी की है।
इसीलिए पार्टी के पदाधिकारी दावा कर रहे हैं कि नई टीम में अंडमान निकोबार से लेकर मुख्य भूमि तक सभी इलाके के लोग तो हैं ही, समाज के हर जाति, धर्म और आयु वर्ग के लोग भी हैं। पार्टी का सांगठनिक आकार बढ़ाए जाने के बाद महिलाओं की भागीदारी बड़े पैमाने पर हुई है। कुल मिलाकर इस टीम में 40 महिलाएं हैं जिसमें 13 पदाधिकारी हैं। यह उपस्थिति अनुपात के लिहाज से भले ज्यादा न हो लेकिन संख्या के लिहाज से भारी लगती है। जाहिर है महिला आरक्षण विधेयक के साथ महिला राजनीति के लिए बन रहे माहौल में यह संदेश देना बेहद जरूरी था। वसुंधरा राजे को महासचिव बनाकर गडकरी ने यह संदेश दे दिया है कि उनकी टीम के गठन पर राजनाथ सिंह का असर कम हुआ है। नजमा हेपतुल्ला और मुख्तार अब्बास नकवी को उपाध्यक्ष बनाकर अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का संदेश तो दिया गया है, लेकिन पीलीभीत के युवा सांसद वरुण गांधी को महासचिव बनाकर उसे संतुलित भी कर दिया गया है। पार्टी को वरुण गांधी जैसा उग्र हिंदुत्ववादी नेता चाहिए, भले उनके बयानों का वह बचाव न कर सके, लेकिन भाजपा अरुण शौरी जैसे स्वतंत्रचेता और दिक्कत पैदा करने वाले बुद्धिजीवी को पार्टी का पद नहीं दे सकती, ऐसा संदेश भी वे देना चाहते हैं।
  
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी में जिस तरह की सर्जरी या कीमोथेरेपी की बात कर रहे थे क्या यह वही है? गडकरी ने जिस प्रकार वाजपेयी, आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे पुराने और दिग्गज नेताओं को संसदीय बोर्ड में रखते हुए नई टीम का विस्तार किया है, उसमें किसी को दरकिनार करने से ज्यादा समावेशिता की नीति दिखाई पड़ती है। व्यावहारिक तौर पर भले वाजपेयी सक्रिय न हों लेकिन उनके नाम की महिमा से पार्टी से जनता जुड़ती है और कार्यकर्ताओं का असंतोष काबू में रहता है। इसी प्रकार आडवाणी भले लोकसभा चुनाव न जितवा पाए हों और संघ परिवार से सैद्धांतिक मतभेद रखते हों, पर उनके योगदान को पार्टी भुला नहीं सकती। कांग्रेस के अनुभवी और युवा नेतृत्व की मजबूत चुनौती को देखते हुए भाजपा सारे घर के बदल डालने का जोखिम नहीं उठा सकती।

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