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14 नबम्बर, 2019|6:11|IST

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ओपिनियन पोल की कवायद

ओपिनियन पोल के दिन आ गए हैं। चुनावी पोल कराने वालों की मौज हो रही है। इस दौर में ये इतना कमा लेते हैं कि बैंकर तक को जलन होने लगती है। आखिरकार इन पोल से किसका फायदा होता है? लोग हैं कि आनेवाले वक्त को जानने के लिए बावले रहते हैं। हर कोई जानना चाहता है कि आगे क्या होने वाला है? चुनावों का मौसम आता है, तो इनकी मांग बढ़ने लगती है, खासतौर पर मीडिया इनके पीछे भागने लगता है। मीडिया को अपना चुनावी अभियान चलाना है। चूंकि लोग चाहते हैं कि उन्हें आगे आने वाले दौर की कोई तस्वीर मिल जाए, इसलिए मीडिया भी ओपिनियन पोल का सहारा लेने लगता है। ये पोल होते हैं और लोग उन्हें देखते रहते हैं। अक्सर तो इन पोल से जो भी निकल कर आता है, वह सही नहीं होता। इतना जरूर होता है कि लोगों को मनोरंजन हो जाता है और उसके चक्कर में इनकी दुकान चल जाती है। यों इन पोल की कोई जरूरत नहीं है। उससे किसीका फायदा नहीं होता। हां, इन्हें कराने वालों की मस्ती रहती है।
द इंडिपेंडेंट लंदन

कोर्ट की भी जिम्मेदारी है
अगर देश में कोई गलत काम करता है, तो उसका मतलब है उसने अपने समाज का भरोसा तोड़ा है। जाहिर है उसके लिए सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन सरकार के साथ-साथ अपनी कोर्ट-कचहरी की भी जिम्मेदारी है कि वे ऐसा कोई भी गलत काम करने वाले शख्स या संस्था को कड़ी से कड़ी सजा दे। उस सजा का मतलब महज इतना ही नहीं है कि उस गलती के लिए सबक मिले। वह सजा इसलिए भी जरूरी है कि आनेवाली पीढ़ी के लिए वह मिसाल हो सके, ताकि उस तरह की गलती दोहराई न जाए।
खलीज टाइम्स दुबई

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