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17 नबम्बर, 2019|1:48|IST

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क्यों नहीं घटते खाद्यान्न के मूल्य

माहंगाई पहले ही कम नहीं थी, बजट ने पेट्रोलियम की कीमतें भी बढ़ा दीं। चावल, आटा, चीनी, खाद्य तेल, दालें और फल-सब्जियों के दाम 1988 की तुलना में करीब-करीब तीन गुणा बढ़ गए हैं। इस महंगाई ने तो गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों की कमर ही तोड़ दी है। वे बुरी तरह आतंकित हैं कि पता नहीं भविष्य में क्या हो? उनकी चिंता खासकर इस बात को लेकर है कि पिछले कुछ वर्षो से मौसम बेरहम हो गया है और किसी भी देश में मौसम की भविष्यवाणी करने वाले लोग निश्चित रूप से यह नहीं बता पा रहे हैं कि कब बारिश होगी, कब ओले पड़ेंगे, कब बर्फ गिरेगी और कब सूखा होगा।
आज की तारीख में सारा संसार सिमट कर एक ‘ग्लोबल विलेज’ हो गया है जिसका अर्थ है कि एक देश में यदि कोई घटना घटती है तो उसका असर पूरे संसार पर पड़ता है। 2007 में चीन में भयानक बर्फबारी हुई थी जिसके कारण वहां के खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो गई थी। यहां तक कि चीन के जिस क्षेत्र में अनाज की पैदावार हुई थी उस क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में यातायात अवरुद्ध होने के कारण अनाज भेजा नहीं जा सका और लोग भुखमरी का शिकार होने लगे। बर्फ पिघलने के साथ ही चीन में अनाज की, खासकर चावल की भयानक मांग बढ़ गई। चीन एक हाथी की तरह है जिसका पेट भरना बहुत ही कठिन है, क्योंकि संसार में सबसे अधिक जनसंख्या चीन की है। चीन ने एशियाई देशों से, खासकर थाईलैंड और वियतनाम से बड़े पैमाने पर अनाज खासकर चावल का आयात करना शुरू कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि संसार की मंडी में चावल का दाम बहुत अधिक बढ़ गया। प्राकृतिक आपदा के कारण 2008 और 2009 में भी एशियाई देशों में, खासकर चीन, भारत, फिलीपीन्स, वियतनाम और इंडोनेशिया में अनाज की पैदावार बहुत कम हुई। इसी कारण इन सभी देशों में खाद्यान्नों के मूल्य बेतहाशा बढ़ गए। मौसम की भविष्यवाणी करने वाले विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी की थी कि सन् 2009 में भारत में भरपूर बारिश होगी जिससे विभिन्न अनाजों की भरपूर पैदावार होगी, परंतु यह भविष्यवाणी शत-प्रतिशत गलत साबित हुई और 2009 में भारत में जैसा सूखा पड़ा वैसा हाल के वर्षो में कभी नहीं पड़ा था। इसी कारण विभिन्न फसलों के साथ-साथ गन्ने की फसल भी मारी गई। चीनी का भरपूर उत्पादन नहीं हो पाया और उसके दाम बहुत अधिक बढ़ गए।
    
अमेरिका और यूरोप के देशों में स्थानीय लोग मुश्किल से 20 प्रतिशत अनाज का उपभोग करते हैं, जबकि एशियाई देशों में चाहे वे विकसित, विकासशील या अविकसित हों, आम जनता के भोजन में अनाज की मात्रा 50 से 80 प्रतिशत रहती है। इंडोनेशिया में हाल के महीनों में खाद्यान्नों के मूल्यों में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जिसके कारण वहां हाहाकार मच गया है। थाईलैंड और फिलीपीन्स में भी इस वर्ष अनाज की बहुत कमी हुई है, खासकर चावल की। इसी कारण इन देशों के व्यापारियों ने भारी मात्रा में अनाज की जमाखोरी शुरू कर दी।
थाईलैंड और फिलीपीन्स में जहां बड़े गोदामों में चावल रखा था वहां सरकार ने सुरक्षा गार्ड तैनात कर दिए जिससे कोई चावल को लूट नहीं सके। इंडोनेशिया में भी सरकार ने देश की सीमा पर भारी मात्रा में पुलिस को तैनात कर दिया है जिससे चावल की तस्करी नहीं हो सके।
इन सभी देशों के व्यापारियों को यह अंदाज है कि जिस तरह भारत और चीन में फसलें खराब हुई हैं, ये दोनों देश भारी मात्रा में अनाज का आयात करेंगे और उस हालत में वे इन देशों से मनमाने दाम वसूल करेंगे। विभिन्न देशों के खासकर एशियाई देशों के व्यापारी जमकर जमाखोरी कर रहे हैं। कहीं-कहीं तो सरकार भी इस तरह की जमाखोरी में उनकी मदद कर रही है, क्योंकि सरकार को भी नहीं पता है कि अगले वर्ष अनाज की कितनी पैदावार होगी। भारत में प्राय: सभी शहरों में जमकर जमाखोरी की हुई है और आए दिन अनाज के दाम मनमाने तरीके से बढ़ा रहे हैं। राज्य सरकारों को यह अच्छी तरह मालूम है कि बिचौलियों ने अपने बड़े-बड़े गोदामों में भारी मात्रा में अनाज छिपाकर रख छोड़ा

है।
परंतु किसी भी राज्य सरकार ने बिचौलियों और जमाखोरों के अनाज को जब्त करने और इन व्यापारियों को जेल में डालने का प्रयास नहीं किया। अभी देर नहीं हुई है। यदि हर राज्य में 10-20 जमाखोरों का माल जब्त कर उन्हें जेल में डाला जाए तो अन्य व्यापारी जमाखोरी करने और अनाज के मूल्य बढ़ाने की हिम्मत नहीं करेंगे।
लेखक पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत हैं।

 

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