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10 दिसंबर, 2019|12:12|IST

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महंगाई की आंच

थोक मूल्य सूचकांक में फरवरी महीने में जो तेज बढ़ोतरी हुई है, वह उसी कष्ट को बताती है जिसे आम भारतीय लगातार झेल रहा है। पिछले वर्ष की तुलना में 9.89 प्रतिशत की बढ़ोतरी विकट महंगाई को व्यक्त करती है लेकिन अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं के लिए चिंता की बात यह है कि यह बढ़ोतरी अपेक्षा से बहुत ज्यादा है। इसके पीछे कई कारण हैं, चीनी की कीमतें बढ़ती ही जा रही हैं, बाकी खाने पीने की चीजें जैसे दालें, भी लगातार महंगी हो रही हैं, इसके अलावा इस तेज बढ़ोतरी का बड़ा कारण पेट्रोलियम पदार्थो का महंगा होना है। औद्योगिक उत्पादन में भारी इजाफे के साथ मुद्रास्फीति बढ़ने का एक सीधा-सीधा अर्थ यह है कि रिजर्व बैंक नकदी की आपूर्ति घटाने की कोशिश करेगा। अगले महीने आने वाली मौद्रिक नीति में इस तरह की घोषणाएं होना लगभग तय है। सरकार ने भी मंदी से निकलने के लिए जो पैकेज दिए थे उनमें भी कटौती ज्यादा तेजी से होगी, ऐसा लगता है। इन उपायों से मुद्रास्फीति पर कुछ लगाम तो लगेगी लेकिन आम आदमी जिस महंगाई को झेल रहा है, उस पर ज्यादा असर नहीं होगा। लोग अपने पेट्रोल के खर्च में कुछ बचत करने की सोच भी लें, लेकिन खाने-पीने की चीजों में कटौती करना मुश्किल है। खाद्य वस्तुओं के दाम जिन वजहों से बढ़े हैं उनका अलग अर्थशास्त्र है ओर उसको रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियां नियंत्रित नहीं करतीं। फिलहाल सरकार भी ऐसी स्थिति में कोई ज्यादा मदद नहीं कर सकती लेकिन जनता के लिए और सरकार के लिए भी राहत की बात यह है कि संभवत: अगले महीने स्थिति बेहतर हो। उम्मीद यह है कि रबी की फसल अच्छी होगी और इससे खाद्यान्नों की आपूर्ति पर अच्छा असर पड़ेगा। चीनी का जहां तक सवाल है, उसका मामला टेढ़ा है और इसे सरकार की नीतियों ने ज्यादा उलझा दिया है। चीनी के मामले में विशेषज्ञों की राय ज्यादा सही लगती है कि सरकार का हस्तक्षेप ज्यादा मुश्किलें पैदा करता है और हम लगातार कम आपूर्ति- बहुत ज्यादा दाम और ज्यादा आपूर्ति- बहुत दाम कम के एक लगातार चक्र में फंसे रहते हैं। हर वक्त चीनी के दाम कुछ हद तक संतुलित बने रहें इसके लिए जरूरी है कि सरकार दूरगामी नीति बनाए और साल-दर-साल तदर्थ नीतियां बनाने से दूर रहे।
यह महंगाई का संकट बहुत गंभीर है और हमारी सरकार को अपनी कुछ नीतियों को सुधारने के लिए एक चेतावनी है। अगर हम अपनी अर्थव्यवस्था को लगातार ऊंची विकास दर के रास्ते पर रखना चाहते हैं तो हमें खेती और खाद्यान्नों के कारोबार की उपेक्षा छोड़नी होगी वरना हम बार-बार ऐसे संकट में फंसते रहेंगे। ऊंची विकास दर से मांग बढ़ेगी और इसके चलते मुद्रास्फीति भी तेजी से बढ़ेगी। इसके लिए जरूरी यह है कि खाद्यान्नों और दूसरी जरूरी चीजों की आपूर्ति बनी रहे और ऐसा तब होगा जब खेती से लेकर तो भंडारण और वितरण की व्यवस्था को कुशल और बेहतर बनाया जाए। किसानों को उनके उत्पाद की लाभदायक कीमत मिलना तय हो और उपभोक्ता को उसकी सही कीमत पर आपूर्ति, यह तभी हो सकता है जब इन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया जाए, वरना हम हर वक्त ऐसी मुश्किलों में फंसे रहेंगे। महंगाई सिर्फ एक वित्तीय समस्या भर नहीं है जिससे मौद्रिक नीतियों से निपटा जाए। यह उत्पादन और उत्पादकता की समस्या भी है।

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