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22 नवंबर, 2019|4:01|IST

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कुरान की आयतों संग संस्कृत के श्लोक

गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल देखनी हो तो मदरसा तालीम ओ तरबियत आइए। यहां छात्र कुरान की आयतें पढ़ते नजर आते हैं, तो कुछ देर बाद वह संस्कृत के श्लोकों का भी मनन करते हैं। बच्चों को इस्लाम के कलमे याद हैं, तो वे गायत्री मंत्र भी पूरी तन्मयता के साथ गुनगुनाते हैं।

मुस्लिम समुदाय के बच्चों के लिए वर्ष 1985 में समाजसेवी असरार खां व सईद अख्तर खां ने गांव जलालपुर में इस मदरसे की नींव रखी थी। लोग असरार खां व सईद अख्तर खां को आधुनिक सर सैय्यद अहमद मानते हैं। तालीम ओ तरबियत मदरसे में एएमयू की तर्ज पर ही दीनी तालीम के साथ अनुशासन को भरपूर तवज्जो दी जाती है। यहां अरबी, फारसी, संस्कृत के साथ-साथ आधुनिक तालीम का भी इंतजाम है।

नर्सरी से 12वीं तक कंप्यूटर और अंग्रेजी की शिक्षा दिए जाने के कारण यह मदरसा अपने आप में मिसाल है। मदरसे में 600 से अधिक छात्र हैं। मदरसे में पवित्र कुरान के हिफ्ज (बिना देखे याद करना) की कक्षा चलती है तो दूसरी कक्षा वेद की होती है। संस्कृत सभी बच्चों के लिए उर्दू की तरह अनिवार्य हैं। पहले मास्टर नफीस अहमद संस्कृत पढ़ाते थे, जबकि वर्तमान में सुरेन्द्र पाल सिंह संस्कृत की शिक्षा देते हैं।

लड़कियों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी जीनत खान संभालती हैं। यहां 150 लड़कियों को पढ़ाने वाली 10 अध्यापिकाएं भी हैं। मदरसे के प्रबन्धक मोहम्मद अब्बास खां ने बताया कि छप्पर के भवन और एक दर्जन बच्चों से शुरू होकर यह पौधा 22 कमरों के भवन और 750 छात्रों के दरख्त में तब्दील हो गया है।

फिलहाल यहां आईटीआई की मान्यता लेने का प्रयास किया जा रहा है। मदरसे के प्रधानाचार्य नूर हसन ने बताया कि
मदरसे में 26 अध्यापकों के स्टाफ में मुल्ला-मौलवियों के अलावा एमएससी, एमफिल शिक्षक हैं, जबकि छह शिक्षक हिन्दू भी हैं।

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