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नए हालात में बदलनी होगी रक्षा नीति

पिछले कुछ समय से भारत में पाकिस्तान पर अलग- अलग तरह की आवाजें सुनाई दे रही हैं। भारत को पाकिस्तान से कोई जवाब मिला है या नहीं इस पर ही सुरक्षा सलाहकार एम. के नारायणन और विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी परस्पर विरोधी बयान दे चुके हैं। लेकिन सबसे आहत करने वाली बात यह उाागर हुई है कि मुंबई के आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को सैनिक जवाब देने की बात इसीलिए आगे नहीं बढ़ाई, क्योंकि सेना के नेतृत्व का कहना था कि उसके हथियार पुराने और नाकाफी हैं। यह आश्चर्य में डालने वाली बात इसलिए है, क्योंकि भारत दुनिया के उन देशों में है, जो रक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। अनुमान है कि अगले चार साल में वह 435 अरब डॉलर के हथियार खरीदेगा। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य ताकत है और उसने सोवियत काल के हथियारों के आधुनिकीकरण की योजना भी बनाई है। इसके बावजूद पाकिस्तान के खिलाफ किसी सैनिक कार्रवाई के विकल्प के आभाव ने उसकी रक्षा नीति की मूल कमजोरियों को उाागर कर दिया है। मुंबई के आतंकवादी हमले के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि सरकार उन सभी लोगों, संगठनों और उनके समर्थकों को छोड़ेगी नहीं, जो आतंकवाद में शािमल हैं। वे चाहे किसी भी धर्म के हों, उनका कोई भी जुड़ाव हो उन्हें भारी कीमत अदा करनी ही पड़ेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि उन पड़ोसियों को भी कड़ा जवाब दिया जाएगा, जो अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादी हमलों के लिए होने देते हैं। अगर वे इसे रोकने के लिए कदम नहीं उठाते हैं तो उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। लेकिन इस बयान से उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि उनके पास कार्रवाई का कोई पुख्ता विकल्प नहीं है। परमाणु हथियार एक महत्वपूर्ण मसला है, क्योंकि इसकी वजह से पाकिस्तानी फौा कोई भी जोखिम उठाने की स्थिति में आ गई है। उन्हें यह पता है कि दोनों देशों के बीच किसी भी लड़ाई का जोखिम परमाणु युद्ध की ओर जाता है, और यह चीज भारत को कोई बड़ा कदम उठाने से रोकेगी। इसलिए पाक फौज और खुफिया एजेंसी अब भारत के खिलाफ आतंकी गुटों को खुलकर मदद देने लगे हैं। भारत की स्थिति यह है कि परमाणु हथियार के बाद पाकिस्तान से बड़ी लड़ाई लड़ना अब वाजिब नहीं। इसलिए ऐसे छोटे सैनिक अभियान चलाए जा सकते हैं जो परमाणु युद्ध तक न पहुंचते हों। परमाणु हथियार ने पाकिस्तान को भारत के किसी बड़े हमले से रक्षा की ढाल दे दी है। साथ ही अब इस क्षेत्र के विवादों पर पूरी दुनिया की नार भी रहती है। पहली बार 1े कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को यह समझ में आया था कि भारत के पास तुरंत और प्रभावी हमले की क्षमता नहीं है। तब थलसेना प्रमुख ने कहा था कि भारतीय सेना के पास जो कुछ भी है, वह उसी से लड़ाई लड़ेगी। बयान से साफ था कि सेना अपनी जरूरत के हिसाब से हथियारों को हासिल करने की स्थिति में नहीं है। यह लड़ाई सिर्फ डेढ़ सौ किलोमीटर के दायर तक ही सीमित थी, इसलिए भारत ने इसे जीत भी लिया और पाकिस्तान को नियंत्रण रखा के पार भेजने में कामयाब रहा। इसके बाद जब 2001 में भारत और पाकिस्तान की सेनाएं सीमा पर आमने -सामने जमा हुई तो यह साफ था कि भारत के पास जो हथियार हैं, उनसे वह किसी भी तरह का सर्जिकल हमला करने की स्थिति में नहीं है। इसी संकट ने भारत को रक्षा खर्च बढ़ाने को मजबूर किया। लेकिन फिर इस राजनैतिक दबाव के ऊपर पुरानी सोच हावी होने लगी। 2004 में जब नई सरकार आई तो उसने पुरानी सरकार के कई रक्षा सौदों की जांच शुरू कर दी। अस्सी के दशक में ऐसे ही कई घोटालों के चलते नौकरशाही ने रक्षा खरीद के जो तौर-तरीके बना दिए थे, वे देरी करने वाले ही थे। जबकि पाकिस्तान ने आतंकवाद से जंग के नाम पर नवीनतम अमेरिकी तकनीक हासिल कर ली है। दूसरी तरफ भारतीय सेना का आधुनिकीकरण कई दशक पीछे खिसक गया है। इसी का नतीजा था कि मुंबई हमले के बाद भारत पाकिस्तान के खिलाफ तुरंत सैनिक कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं था। परंपरागत युद्ध में भारत के पास अब पाकिस्तान के खिलाफ वैसा वरदहस्त नहीं है जसा कि पिछले पांच दशक में था। भारतीय सेना ने 2001-02 के ऑपरशन पराक्रम के बाद ऐसी नीति तैयार करने की कोशिश जरूर की है, जो पाकिस्तान की बढ़ती उद्दंडता का सटीक जवाब दे सके। ‘कोल्ड स्टार्ट’ नाम की यह रणनीति मूल रूप में परमाणु हथियार की छतरी के नीचे सीमित युद्ध लड़ने की है। अब भारत जिस रणनीति पर ध्यान दे रहा है वह जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान पर तुरंत और निर्णायक हमला बोलने की है। इसके पीछे की सोच यह है कि इसके पहले कि पूरी दुनिया कोई प्रतिक्रिया दे कार्रवाई खत्म हो चुकी हो। यह कार्रवाई इतनी सीमित होगी कि पाकिस्तान इसके लिए अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल न कर सके। ऐसी रणनीति के लिए अच्छे व आधुनिक किस्म के हथियारों की जरूरत पड़ेगी, जिन्हें भारत को प्राथमिकता के आधार पर हासिल करना होगा। इसी चीज को ध्यान में रखते हुए अब सरकार ने हथियार खरीदने की प्रक्रिया को तेज बनाने का फैसला किया है। भारतीय सेना को तुरंत ही रात के अंधेर में देखने के लिए नाइट विज़न, हल्की माउंटेन गन और आर्टिलरी की जरूरत है। नौसेना को इंटरसेप्टर नौकाए और ऐरोस्टेट रॉडार चाहिए। वायुसेना को हवाई रक्षा की मिसाइल प्रणाली और ट्रॉस्पोर्टेशन रॉडार चाहिए। मुंबई हमले के बाद जो हो हल्ला हुआ है उससे सरकार ने कुछ अल्पकालिक तौर-तरीके अपनाए हैं। लेकिन सिर्फ इन्हीं से भारतीय रक्षा नीति की खामियां खत्म नहीं हुईं। जब तक दीर्घकालिक रक्षा हितों के हिसाब से कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं बनाई जाएगी भारत को इस तरह की समस्याओं से दो-चार होना ही पड़ेगा। इसलिए कोई हैरत नहीं है कि कारगिल युद्ध की तरह ही मुंबई के हमले के बाद भी भारतीय बुद्धिाीवी उसी पुरानी बहस में उलझ गए कि ऐसी वारदात को रोकने के लिए देश में किस किस्म के संस्थागत सुधार होने चाहिए। हर बार यही लगता है कि तुरंत कार्रवाई के लिए एक नया ढांचा होना चाहिए लेकिन मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा संगठन के पास धन की भी कमी है और कर्मचारियों की भी। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि अगर बड़े संस्थागत बदलाव नहीं हुए तो नया ढांचा कारगर होगा भी या नहीं। लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं।

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