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देहदान : कौन बनेगा आधुनिक दधीचि?

शुक्रवार को लखनऊ के समाजवादी नेता चंद्र दत्त तिवारी का निधन हुआ तो उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका शरीर चिकित्सा विश्वविद्यालय के एनॉटमी विभाग को सौंप दिया गया। हालांकि मृत्यु के बाद देहदान की इच्छा रखने वाले वे पहले शख्स नहीं हैं,ड्ढr लेकिन यह ऐसा रास्ता है जिस पर बहुत कम ही लोग चलते हैं। पिछले दिनों गाजियाबाद के एक 62 वर्षीय व्यक्ित ने अपने मृत्योपरान्त 15 जरूरतमन्द मरीजों को एक नयी जिन्दगी की शुरुआत करन का मौका दिया। इतना ही नहीं इस शख्स ने देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थान ‘एम्स’ के बोन बैंक को नवजीवन प्रदान किया। उनकी मृत्य असमय हृदयगति बन्द होने से 26 दिसम्बर को हुई। उन्होंने अपने मृत्यु के पहले अपने आत्मीयजनों को यह सूचित कर दिया था कि उनके समूचे शरीर को चिकित्सा संस्थान को दे दिया जाए ताकि उसका वह यथोचित उपयोग कर सकें। विडम्बना यही थी कि हृदयरोगी होन के चलते सिर्फ उनका कार्निया और हड्डियों को इस्तेमाल किया जा सका। गौरतलब है कि 1में अपनी स्थापना के समय से अब तक महज नौ लोगों द्वारा किए गए हड्डीदान से 250 से अधिक मरीजों को फायदा हो सका है। कई सारी जटिल सर्जरी या बोन टयूमर या दुर्घटना एक्िसडेंट के बाद हड्डी की हानि के चलते हड्डियां को प्रतिस्थापित करना पड़ता है। लकड़ी और सिंथेटिक वूल के जरिए डॉक्टर मृत शरीर को पुराने रूप में ला देते है, न हाथ-पांव टेढे-मेढ़े दिखते हैं, न कोई अन्य विकृति। डॉक्टर बताते हैं कि सांस रुकने के बाद भी शरीर के कई हिस्सों को निकाल कर दूसरों के शरीर पर प्रत्यारोपित किया जा सकता है- नेत्रदान के अलावा आंख का पारदर्शी परदा (कार्निया), हड्डियां, त्वचा, कुछ मुलायम उतकटिश्यूज, किडनीमूत्रपिण्ड, लीवरजिगर, हृदय, फेफडें, स्वादुपिण्ड जैसे महत्वपूर्ण अंगों को आसानी से प्रत्यारोपित किया जा सकता है। अगर मृत्यु के बाद दिल की टिक-टिक बन्द हो भी जाये, तब भी नेत्रदान और त्वचादान सम्भव होता है। लकिन जिस व्यक्ित के दिल की टिक-टिक जारी है, लकिन वह ब्रेनडेड (मस्तिष्कस्तम मृत्यु) है, उसके हृदय और सांस की प्रक्रिया को कृत्रिम उपकरणों के सहारे जारी रखते हुए किडनी, फेफड़े, लीवरजिगर और स्वादपिण्ड जैसे अवयव प्रत्यारोपण के लिये अलग किये जा सकते हैं। इन हिस्सों को शरीर से अलग करन के लिये 4-5 घंट का ऑपरेशन चलता है। बहुत कम लोग यह भी जानते हैं कि भारत में हर साल लगभग दो लाख लोग दिल, आंत और लीवर की ऐसी बीमारियों से मरते हैं, जिन्हें अगर अवयवदान मिल सकें तो उनकी जान बच सकती है। इस सम्बन्ध में देश की औद्योगिक राजधानी कही जानेवाली मुंबई की रिपोर्ट बहुत चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। वर्ष 2006 में वहां महज 15 लोगों ने देहदान किया। अगर डेढ़ करोड़ के करीब आबादी वाली मुम्बई की आबादी के हिसाब से चलें तो इसका अर्थ यही है कि दस लाख में से सिर्फ एक व्यक्ित ने इस बात का साहस किया। और अगर अवयवदान के आगे बढ़ कर व्यक्ित देहदान करे तो उसका शरीर चिकित्सा-विज्ञान के विद्यार्थियों के प्रशिक्षण के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। अवयवदान और देहदान की समाज को कितनी अधिक जरूरत है इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अकेले मुंबई में 850 से अधिक मरीज किडनी प्रत्यारोपण के इंतज़ार में है। दुनिया में सबसे अधिक नेत्रहीन हमार देश में ही हैं। इनमें स कइयों की दृष्टि लौटाई जा सकती है, बशर्ते कोई नेत्रदान के लिये तैयार हो। अब जहां तक देहदान या अंगदान का सवाल है, यही प्रतीत होता है कि भारत जैसे विकासशील मुल्कों से लेकर यूरोप के विकसित देशों में भी काफी समानतायें हैं। इसका प्रत्यक्ष दर्शन पिछले दिनों नीदरलैण्ड में टीवी पर आयोजित एक रियलिटी शा के दौरान हुआ था। इस बहुप्रचारित रियलिटी शो की विषयवस्तु थी ‘एक महिला तय करना चाहती है कि वह अपनी किडनी किसे दान करे’ यूरोप और अमेरिका में भी लाखों लोगों ने देखा। बाद में पता चला कि यह एक और फर्जीफेक शो है। लकिन इस फर्जी शा का एक सार्थक नतीजा यह निकला कि लोगों को इस बात का गहराई से एहसास हुआ कि यह समस्या कितनी बड़ी है और 12,000 से अधिक लोग आगे आये, जिन्होंने यह घोषणा की कि वह अपनी किडनी दान देन के लिए तैयार है। लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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