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9 दिसंबर, 2019|9:47|IST

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हर बार सही होने का वहम बिगाड़ सकता है रिश्ता

हर बार सही होने का वहम बिगाड़ सकता है रिश्ता

जीवन और कर्म मानव जीवन के दो ऐसे अभिन्न पहलू हैं जिन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। लेकिन समस्या तब आती है जब व्यक्ति केवल अपने किए हुए को सही मानता है और दूसरे व्यक्ति का काम उसे हमेशा गलत नजर आता है। बहरहाल, हर बार यह धारणा सही साबित नहीं होती, लेकिन खुद के सही होने का वहम अच्छे खासे रिश्ते में दरार डाल देता है।

आलोचना का शिकार होने वाले लोगों को अक्सर संयम बरतने की सलाह दी जाती है, लेकिन 16 मार्च एक ऐसा दिन है जब आप अपने हर काम को और अपनी हर बात को सही मान सकते हैं क्योंकि इस दिन 'एवरी थिंग यू डू इज राइट डे' मनाया जाता है।

राजधानी के एक सांध्य कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक प्रो. अमोल चटर्जी कहते हैं कि हममें से अधिकतर लोग अपने किए हुए कामों को ही सही मानते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी सोच सही है और उन्होंने जो भी कुछ किया, वह सही था। दूसरे व्यक्ति के काम में उन्हें हमेशा दोष नजर आता है। यह मानसिकता सही नहीं है।

प्रो. चटर्जी कहते हैं ऐसा नहीं है कि हर बार दूसरा व्यक्ति ही गलत होता है। हर व्यक्ति को अपने हालात के अनुसार फैसले करने होते हैं। ऐसे में सही गलत का अनुमान स्वयं लगाने का मतलब होता है कि हम कहीं न कहीं अपने अंदर अहंकार को मजबूत कर रहे हैं। अगर अहंकार न हो, तो हमें अपने काम में हुई भूल या अपना गलत फैसला साफ समझ में आ जाएगा।

मनोविज्ञानी शांति रहेजा कहती हैं कि स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भावना ही अपने फैसलों को सर्वश्रेष्ठ मानने के लिए मजबूर करती है। लेकिन हम तब यह भूल जाते हैं कि सामने वाले के पास भी सोचने समझने की क्षमता है। हमें सामने वाले के फैसले में कमी निकालने से पहले यह सोचना चाहिए कि क्या उसका अनुभव हमसे अधिक है।

रहेजा कहती हैं कि स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ समझने की वजह से कई बार अच्छे से अच्छे संबंधों में तनाव आ जाता है, क्योंकि ऐसे में अक्सर हमारा आचरण सामने वाले को तुच्छ होने का एहसास कराता है। बेहतर होगा कि हम स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानना बंद करें।

एक अन्य मनोविज्ञानी मालती मिश्रा कहती हैं कि हमारी सोच और हमारे आचरण पर सर्वाधिक प्रभाव हमारे आसपास के माहौल का होता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने बच्चों को ऐसा माहौल दें, जिसमें उनकी सोच अच्छी तरह विकसित हो और साथ ही वह यह भी न सोचें कि वही सर्वश्रेष्ठ हैं। अन्यथा उनका विकास भी उसी मानसिकता के साथ होगा और वे भी आत्ममुग्धता की स्थिति में उलझ जाएंगे।

मालती ने कहा कि एक कलाकार तब ही स्वयं को साबित कर पाता है जब उसके अंदर सीखने की ललक बरकरार रहती है। जिस दिन वह सोचेगा कि अब वह पूर्ण हो चुका है और उसे सब कुछ आता है, उस दिन वह अहंकार का शिकार हो जाएगा। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ न मानने वाला व्यक्ति ही सफलता की राह में अग्रसर हो पाता है।

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