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12 नबम्बर, 2019|2:09|IST

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भविष्य के चैंपियन

भारत की एक मेडिकल लेबोरेटरी ने एक जेनेटिक परीक्षण प्रस्तुत किया है, जिससे पता लग सकता है कि आपका बच्चा किस खेल में महारत हासिल कर सकता है। यह टेस्ट मुंह के अंदर से एक स्वैब लेकर किया जाता है और करीब दो हजार रुपए में हो जाता है। हो सकता है कि कुछ मां-बाप, जो अपने बच्चे को अगला तेंदुलकर बनाना चाहते हैं वे पाएं कि उनके बच्चे में तेंदुलकर होने की तो नहीं, लेकिन उसैन बोल्ट या रॉजर फेडरर होने की ज्यादा संभावना है।

वैसे यह न समझा जाए कि बच्चे के जेनेटिक परीक्षण से यह पता चल जाएगा कि वह क्रिकेट ज्यादा अच्छा खेलेगा या फुटबाल। दरअसल, यह कोई जादू नहीं है, इसके पीछे सरल विज्ञान है। मनुष्य के शरीर की मांसपेशियों में दो तरह के फाइबर होते हैं। कुछ फाइबर तेजी से सक्रिय होते हैं, लेकिन वे जल्दी थक जाते हैं। दूसरी तरह के फाइबर वे होते हैं, जिनकी गति धीमी होती है, लेकिन वे जल्दी थकते नहीं हैं।

तेज दौड़ने में पहली तरह के फाइबर ज्यादा सक्रिय होते हैं और पैदल चलने में दूसरी तरह के। जिनकी मांसपेशियों में पहली तरह के फाइबर ज्यादा होते हैं, वे तेज दौड़ या वजन उठाने जैसे खेलों में ज्यादा अच्छे होते हैं, जिनमें कम देर के लिए ज्यादा ताकत और फुर्ती चाहिए। दूसरी तरह के फाइबर ज्यादा हों तो इंसान लंबी दूरी की दौड़ में सफल हो सकता है।

अगर दोनों का अनुपात समान हो तो हॉकी या फुटबाल या मध्यम दूरी की दौड़ में सफलता की संभावना ज्यादा है। जिस परीक्षण की हम बात कर रहे हैं उससे पता चल जाएगा कि बच्चे के शरीर में किस तरह की मांसपेशियों की प्रधानता है, बाकी उसका किसी खेल में सफल होना न होना दिलचस्पी, मेहनत, लगन और तमाम सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थितियों पर निर्भर होगा।

ऐसा भी नहीं कि प्रकृति ने सब कुछ यांत्रिक ढंग से तय किया है। इसकी मिसाल हमारे वक्त के सबसे अनोखे एथलीट उसैन बोल्ट हैं। छोटी दूरी के दौड़ाक आमतौर पर कद में अपेक्षाकृत कम और मजबूत कद काठी के होते हैं।

उसैन बोल्ट लंबे हैं, अपेक्षाकृत दुबले-पतले हैं। ऐसी कद काठी मैराथन या 1000 मीटर दौड़ने वालों की होती है, लेकिन बोल्ट ने सौ मीटर और दो सौ मीटर में तहलका मचा रखा है। इसलिए मां-बाप अपने बच्चे पर तेंदुलकर या बोल्ट होने पर जोर न दें तो अच्छा लेकिन इस टेस्ट के अपने दूसरे फायदे हैं। इससे पता चल सकता है कि शरीर को फिट रखने के लिए कौन-सी कसरतें किसलिए जरूरी हैं। रोजमर्रा के जीवन में ताकत की जरूरत होती है और दमखम की भी।

खेलों में विज्ञान का उपयोग काफी बढ़ रहा है और संभव है कि ऐसे परीक्षण हमें भविष्य में चैंपियन तलाशने में मदद करें। यह भी सही है कि विज्ञान के दुरुपयोग ने खेलों पर संदेह का कुहासा भी फैलाया है। प्रदर्शन सुधारने के लिए दवाओं का इस्तेमाल रोकना तमाम कड़ाई के बाद कठिन हो रहा है।

लेकिन यह आज ही नहीं हुआ है, बहुत प्राचीन काल से प्रदर्शन सुधारने के लिए उपलब्ध विज्ञान की सहायता ली जाती थी। पुराने जमाने में भी खिलाड़ी या सैनिक दमखम बढ़ाने के लिए नशे का इस्तेमाल करते थे, अब जानकारी ज्यादा है, इसलिए दुरुपयोग भी ज्यादा है। लेकिन विज्ञान का सदुपयोग तो अच्छा ही है और हमें मानना चाहिए कि लगन, मेहनत और सच्चाई जैसे मानवीय गुण ही अंत में जीतते हैं।

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