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17 नबम्बर, 2019|8:00|IST

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बचपन में ही किडनी रोग का इलाज कराना मुफीद

बचपन में ही किडनी रोग का इलाज कराना मुफीद

गंभीर रूप से अस्वस्थ नवजात शिशुओं में किडनी का फेल होना सबसे आम बीमारी है। ऐसे 80 फीसदी से अधिक बच्चे एक्यूड रेनल फैल्यर के नाम से मशहूर एक्यूट किडनी इंजरी की चपेट में होते हैं।

चिंता में डाल देने वाला यह आंकड़ा बताता है कि गहन चिकित्सा कक्ष में कम से कम 30 से 50 फीसदी मरीज और अस्पतालों में भर्ती पांच फीसदी बच्चे इस हालात से दो—चार होते हैं।

इसके अलावा, भारत में तकरीबन 3,00,000 बच्चे एंड स्टेज रेनल डिजीज से पीडि़त हैं। इनमें से पांच फीसदी से भी कम बच्चों को रेनल रिप्लेसमेंट थेरेपी नसीब होती है।

राजधानी के एक अस्पताल की ओर से पिछले सप्ताह किए गए एक अध्ययन के नतीजों में यह आंकड़ा सामने आया था।

बत्रा अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ संजीव बगाई ने बताया कि किडनी शरीर के कॉर्नर स्टोन होते हैं और ये शरीर में मेटाबोलिक संतुलन, शरीर के भीतर के तरल पदार्थ, नमक और ब्लडप्रेशर बनाए रखने में मददगार होत हैं।

बगाई ने बताया ज्यादातर इंजरी सब—क्लीनिकल स्तर पर होती है। रेनल इंजरी को पहचानकर इसके इलाज में देरी से जान पर बन आती है।

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