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13 नबम्बर, 2019|11:17|IST

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अगर इस देश में सिख न हों तो..

हाकी वर्ल्ड कप में हिंदुस्तान-पाकिस्तान मैच से पहले मैं कुछ नॉस्टाल्जिक हो गया। हिंदुस्तान ने पाकिस्तान को उतना नहीं हराया जितना पाकिस्तान ने हमें हराया है। एक वक्त था जब हॉकी हमारा नंबर एक खेल था। कई सालों तक हम दुनिया में सबसे आगे थे। हालात तब बदलने शुरू हुए, जब हिंदुस्तान पाकिस्तान अलग हो गए। और पाकिस्तान हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरा। बाद में ऑस्ट्रेलिया, मलयेशिया, कोरिया, स्पेन, हॉलैंड, जर्मनी और इंग्लैंड तेजी से आगे निकलने लगे।
 
अब हिंदुस्तान-पाकिस्तान मुकाबले का इंतजार करते-करते मेरा बुरा हाल था। मैं उसे टीवी पर देखना चाहता था। लेकिन सही चैनल मिल नहीं रहा था। मैं परेशान था कि आखिर क्या हुआ? अगले दिन होली थी। मुझे लगा कि शायद अखबार न आएं। तब मुझे सुबह-सुबह टीवी की खबरें देखनी पड़ेंगी। या फिर हरजीत कौर को फोन कर पूछना पड़ेगा, क्योंकि उन्हींके होटल ‘ली मेरेडियन’ में पाकिस्तानी टीम रुकी हुई है।
 
लेकिन सुबह 6-30 बजे ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ आ गया। पहले पेज पर ही खबर थी। हिंदुस्तान ने पाकिस्तान को आसानी से 4-1 से हरा दिया था। मेरे मुंह से बेसाख्ता शाबाश निकल गया। मेरी परेशानी मिट गई थी। रंगों का त्योहार मनाने का इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता था? मैं उस जीत में हिंदुस्तानी सिख ढूंढ़ने लगा। और मेरा दिल फख्र से भर गया। क्या मैं अपने आखिरी सालों में सांप्रदायिक हो गया हूं? लेकिन मैं तो एक अच्छा सिख भी नहीं हूं।
 
मुझे याद आया कि और खेलों के मामले में भी मेरा यही सोचना था। क्रिकेट की तरफ मेरा रुझान तब बढ़ा था, जब बिशन सिंह बेदी हिंदुस्तानी टीम के कप्तान बने थे। मैं हदें पार कर उनसे दोस्ती करने में जुट गया था। वह बाद में बेहतरीन जोक्स सुनाने वाले साबित हुए। हरभजन सिंह जब कोई विकेट लेता, तो मेरे मुंह से निकल जाता ओ शाबाश पुत्तर। जब वह विकेट नहीं ले पाता तो निकलता फिटे मुंह यानी शर्म करो।

ऐसा ही तब महसूस हुआ था, जब अभिनव बिंद्रा ने हिंदुस्तान को पहला ओलिंपिक गोल्ड दिलवाया था। तब मैंने हर किसीसे कहा था, ‘क्या जानते हो कि वह सिख है।’ गोल्फ में भी जीव मिल्खा सिंह, अजरुन अटवाल, ज्योति रंधावा और गगनजीत भुल्लर सभी मोने सरदार हैं।

क्या अपने मजहब के लोगों के बारे में सोचना सांप्रदायिक हो जाना है? मुझे तो ऐसा कतई नहीं लगता। उसकी सीधी सी वजह है। जब भी अलग सिख देश बनाने की बात चली है, उसकी मैंने जम कर खिलाफत की है। मैंने हमेशा खालिस्तानियों से कहा है, ‘ओए खोत्तेयो क्या जानते हो कि तुम इस देश को बचाने के लिए हो। देश को तोड़ने के लिए नहीं।’ मैं कभी सोचता हूं कि इस देश का क्या होगा अगर सिख न हों तो? यह देश अपना ज्यादातर ‘सेन्स ऑफ ह्यूमर’ बर्बाद कर देगा।

जहां तक मेरे निजी रिश्तों का सवाल है, मैं अपने सिख दोस्तों को उंगलियों पर गिन सकता हूं। मेरे हिंदू और ईसाई दोस्त कहीं ज्यादा हैं। मैं अपने मुसलमान दोस्तों से ज्यादा करीबी महसूस करता हूं। शायद उर्दू शायरी की वजह से। लेकिन मैं यह कहने से नहीं झिझकूंगा कि सिखों के बिना हिंदुस्तान का परचम कौन लहराएगा?  आखिर में जब ऑस्ट्रेलिया और स्पेन से जब हिंदुस्तान हार गया तब मैंने कहा, लानत होवे। 

चिराग तले अंधेरा
कुछ हफ्ते पहले मुझे कुछ पेंटिंग के कार्ड मिले। मुझे अच्छे लगे। मैंने सोचा कि आखिर ये बनाए किसने हैं। दो दिन बाद एक चिट्ठी मिली। उसमें न पता था और न ही टेलीफोन नंबर। लेकिन मैं समझ गया कि यह अमरजीत ने भेजी हैं। वह मेरी मौसी की बहू है। भाई मोहनजीत कुछ साल पहले ही दुनिया छोड़ चुके हैं। मैं मोहनजीत को तब से जानता हूं, जब वह चार साल के थे। मैं तब लाहौर में वकालत कर रहा था। वहां पर मैंने मौसाजी से ऑफिस के लिए कमरा किराए पर लिया था। बंटवारे के बाद हम अलग-थलग हो गए। अपने-अपने माता-पिता के जाने के बाद हम ठीक से मिल भी न सके।

लेकिन मुझे मोहनजीत की बीवी की एक बात याद रही कि जब भी वह दुखी होती है, तब शायरी करती है। उसे कई ट्रैजेडी से गुजरना पड़ा। सो, दुख उसके साथ लगा ही रहा। पहले पिता ने खुदकुशी कर ली। बाद में दो बेटियां चल बसीं। पहली को पति ने मार दिया। दूसरी दुर्घटना में मर गई। वह तब शायरी, पेंटिंग और अध्यात्म की शरण में चली गई। पति की मौत के बाद उसने अपना नाम अमर मोहनजीत कर लिया। अभी तक उसने अपने कामों की प्रदर्शनी नहीं लगाई है। लेकिन मुझे भरोसा है कि अगर वह लगी तो हिट जाएगी।

 

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