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14 नबम्बर, 2019|7:07|IST

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प्रगति का आधार

मनुष्यों ने देखा कि वह जो कुछ पाते हैं, उसके बाद देखते हैं कि यह तो बहुत थोड़ा है, इससे अधिक चाहिए। फिर जब वह भी मिला तो फिर देखते हैं कि उन्हें वह भी थोड़ा लगा। फिर प्रयास करते हैं कि और चाहिए। अल्प में, थोड़ी सी कुछ चीज मिल गयी, जिससे उन्होंने सोचा था कि सुख की सम्प्राप्ति होगी, उसके बाद उन्हें फिर चाह नहीं रहेगी, किन्तु देखते हैं कि इसमें भी उनकी चाह नहीं मिटी, और चाहिए, और चाहिए, अल्प से सन्तोष नहीं हुआ। मनुष्य ने अन्तत: देखा कि उसे अनन्त चाहिए, जिसकी सीमायें हैं, जो शान्त है, उससे वह सुख नहीं मिला।

फिर खोज में मनुष्य लग गये। तब उन्हें पता लगा कि सिर्फ एक ही सत्ता है, जो अनन्त है और वह है परमपुरुष। मनुष्य अगर सुखी होना चाहता है, तृप्ति चाहता है, तो उन्हें परमपुरुष की खोज करनी होगी। सिवाय उनके कोई और वस्तु उन्हें तृप्ति नहीं दे सकती। इसी सुख प्राप्ति की एषणा से धर्म-जीवन का प्रारम्भ हुआ।
‘सुखं वांछति सवरेंहि तच्च धर्मसमुद्भूतं। तस्माद् धर्म सदाकार्य: सर्ववर्णै: प्रयत्नत:।’

यह जो परमपुरुष को पाने का प्रयास है, यह जो धर्मसाधना है, वह सबको करनी चाहिए, इसे करना ही मनुष्य की पहचान है। जो इसे करते हैं, वही मनुष्य हैं, जो नहीं करते वह मानवता को कलुषयुक्त कर देते हैं, समाज को ध्वस्त कर मनुष्य के नाम पर कलंक लगा देते हैं। इसलिए मनुष्य को यदि सही इंसान बनना है, मनुष्य बनना है तो उन्हें धर्मजीवन में आना है। मानव मन की यही विशेषता है कि अल्प से उन्हें सन्तोष नहीं मिलता है।

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