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साल भर में बढ़े 4 लाख मुकदमे

उत्तर प्रदेश में न्याय व्यवस्था चरमराने की स्थिति में पहुँच गई है। लम्बित मुकदमों की संख्या हर साल घटने की बजाय बढ़ती जा रही है। पिछले साल भर में न्यायालयों पर करीब पौने चार लाख मुकदमों का और बोझ बढ़ गया। उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों में लम्बित मुकदमों की कुल संख्या अब करीब 60.72 लाख हो गई है। इस वजह से त्वरित न्याय का सिद्धांत लगभग बेमानी साबित हो रहा है।ड्ढr इस व्यवस्था के लिए पूरा तंत्र जिम्मेदार है। यह सही है कि प्रदेश की बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से दीवानी और फौजदारी के मुकदमे भी बढ़ते जा रहे हैं। अपेक्षा के अनुरूप न तो नई अदालतें खुल रही हैं और न ही न्यायिक अधिकारियों की भर्ती शीघ्र हो पा रही है। रिक्त पदों को भरने में भी कई वर्ष लग जाते हैं। यद्यपि लम्बित वादों के शीघ्र निपटारे के लिए राय सरकार और उच्च न्यायालय हमेशा चिंतित दिखाई देता है और न्यायिक अधिकारियों के लम्बित मुकदमों के निस्तारण का न्यूनतम कोटा भी निर्धारित कर दिया गया तब भी समस्या का हल नहीं दिखाई दे रहा है।ड्ढr हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश का कहना है कि लम्बित मुकदमों को कम करने के लिए शासन में दृढ़ इच्छाशक्ित होनी चाहिए। हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने किसी सिविल मैटर में कोई निर्णय दिया है, उस फैसले के सिद्धान्त को उसी प्रकृति वाले अन्य मामलों में भी अमल में लाना चाहिए। लेकिन शासन तंत्र हमेशा से उसी प्रकृति वाले हजारों लोगों को बाध्य करता है कि वे भी उच्च अदालत की शरण में जाएँ और राहत का आदेश लेकर आएँ। इस वजह से न्यायालयों में लम्बित मुकदमों की संख्या घटने का नाम नहीं ले रही।ड्ढr प्रदेश के एक पूर्व महाधिवक्ता से जब इस बारे में बात की गई तो उनका कहना था कि न्यायालयों में फौजदारी के मामले समझने वाले जजों की कमी है। जिसने पहले सिविल मैटर ही डील किए हैं उसे फौजदारी मामलों के निस्तारण में अनुभव की कमी देखते हुए दिक्कत होती है। इस वजह से फौजदारी के मामलों के निस्तारण में तेजी नहीं आ पा रही है। हालत यह है कि अदालतें साल भर में जितने मुकदमों का निस्तारण करती हैं, उससे कहीं अधिक नए मुकदमे दायर हो जाते हैं। अधीनस्थ न्यायालयों में बीते 31 दिसम्बर तक करीब 51.60 लाख मुकदमे लम्बित थे इनमें से करीब 30लाख मुकदमे फौजदारी से संबंधित हैं। इसी तरह हाईकोर्ट में इस समय लम्बित कुल मुकदमों की संख्या करीब लाख है। इनमें से फौजदारी के मुकदमे करीब 2.51 लाख हैं।

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