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कब होगी बिहार के ‘स्लम्स’ की जय

ऑस्कर में तो ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ की जय हो गई। अब बिहार में भी ‘स्लम्स’ की जय होने के आसार हैं। झुग्गी- झोपड़ी और गंदी बस्तियों में रहने वालों के बच्चे स्कूल जाएंगे। परिवार के साथ कॉलोनी में रहेंगे। वैसे भी झुग्गी- झोपड़ियों में रहने वालों की जिंदगी में है क्या। बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं सबसे महरूम। राजधानी पटना के स्लम इलाकों की यही तस्वीर देश के अन्य स्लम्स से खराब ही है। दावे हाार हुए लेकिन पूरा एक नहीं। पटना नगर निगम ने अपने सव्रेक्षण में 72 क्षेत्रों को स्लम एरिया के रूप में घोषित किया है।ड्ढr ड्ढr इनमें 34 हाार परिवार रहते हैं। शिक्षितों की संख्या मात्र 10 फीसदी है। राजधानी में अघोषित स्लम की संख्या भी सैंकड़ों में है। नुर्म में बेसिक सर्विसेज टू अर्बन पुअर योजना बनी है लेकिन पूर्व की योजनाएं ही रफ्तार नहीं पकड़ पा रहीं। लेकिन अब पूर प्रदेश के लिए 340 करोड़ की योजना को मंजूरी मिल गयी है। यह दीगर है कि बिहार में कोई भी स्लम नोटिफाइड नहीं है। हालांकि राज्य सरकार ने पटना में और बिहारशरीफ तथा बेगूसराय में एक-एक ऐसी बस्ती को चिह्न्ति किया है, जिन्हें स्लम कहा जा सकता है। नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव दीपक कुमार का कहना है कि राज्य सरकार सूबे में 6 जगहों पर 10-10 एकड़ जमीन खरीदेगी। जहां इन लोगों के लिए आवासीय कॉलोनी, स्कूल और अस्पताल होंगे।ड्ढr ड्ढr वित्तीय वर्ष 2010-11 तक इस योजना को पूरा करने का लक्ष्य है। जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकृत मिशन(नुर्म) से जुड़ी यह योजना करीब 540 करोड़ रुपए की है। इसमें केन्द्र और राज्य सरकार की 50-50 फीसदी भागीदारी होगी। 340 करोड़ रुपए की योजना स्वीकृत हो चुकी है और करीब 200 करोड़ रुपए की योजना पाइप लाइन में है।ड्ढr दूसरी तरफ स्वयंसेवी संस्था निदान की संयोजिका शिखा वर्मा के मुताबिक नुर्म के तहत राजधानी के 14 स्थानों पर साढ़े बारह हाार घर बनाने के लिए 313 करोड़ रुपए की राशि निर्गत की जा चुकी है लेकिन जमीन के अभाव में मात्र फुलवारी में ही काम शुरू हो पाया है। सरकार एनओसी नहीं दे रही है।

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