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19 नबम्बर, 2019|11:02|IST

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राह में हैं कांटे बहुत, मंजिल अभी भी दूर खड़ी

राह में हैं कांटे बहुत, मंजिल अभी भी दूर खड़ी

महिला आरक्षण विधेयक ने अपने 14 साल के लम्बे सफर में संसद में तमाम बाधाओं और नाटकीय घटनाक्रमों की वजह से लटकने के बाद पहला विधायी चरण तो पार कर लिया लेकिन लोकसभा और देश की आधी राज्य विधानसभाओं से मंजूरी मिलने और प्रक्रियागत तमाम जटिलताओं के कारण विशेषज्ञों का मानना है कि इसे अभी अमल में आने में काफी समय लग जायेगा।

लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने कहा कि अभी तो यह विधेयक राज्यसभा में पास हुआ है। इसे अभी लोकसभा और देश की आधी राज्य विधानसभाओं की मंजूरी लेनी होगी। इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा।

उन्होंने कहा राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद भी इसे तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक इसकी प्रक्रियाओं को तय नहीं किया जाता। उन्होंने कहा अभी इस विधेयक में 15 साल के लिए महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण और हर पांच साल के बाद सीटों में क्रमवार बदलाव का उल्लेख है।

कश्यप ने कहा इसे लागू करने की प्रक्रिया तय करनी होगी। यह निर्धारित करना होगा कि पहले पांच वर्षों के लिए किन-किन सीटों को एक तिहाई आरक्षण के तहत आरक्षित किया जायेगा। लोकसभा के पूर्व महासचिव ने कहा कि इसे लागू करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक वास्तव में संविधान संशोधन है जिसका प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किया गया है लेकिन इस बात को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है कि इससे संसद के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़े।

उन्होंने कहा कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया काफी जटिल है और महिला आरक्षण विधेयक के संबंध में जो प्रक्रिया अपनायी गई है वह संसद के विशेष बहुमत की पद्धति पर आधारित है। उन्होंने कहा राज्यसभा और लोकसभा से पास होने के बाद इसे देश की आधी राज्य विधानसभाओं से मंजूरी प्राप्त करना होगा। इसलिए अभी इस विधेयक को कई बाधाओं को पार करना है।

इससे पहले, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की जद्दोजहद इस विधेयक पर आम राय नहीं बन पाने की वजह से बेकार साबित हुई। वर्ष 1996 से अलग-अलग सरकारें महिला आरक्षण विधेयक को सदन में पारित कराने की भरपूर कोशिश करती रहीं लेकिन हर बार नाकामी हाथ लगी।

कई बाधाओं के बाद राज्यसभा में ऐतिहासिक रूप से हरी झंडी पाए इस विधेयक को पहली बार 12 सितम्बर 1996 को एचडी देवेगौड़ा सरकार ने लोकसभा में पेश किया था।

महिला आरक्षण विधेयक के कानून बनने के बाद लोकसभा की 543 सीटों में से लगभग आधी (48 प्रतिशत) यानी 263 सीटें आरक्षित हो जाएंगी और केवल 280 ही सामान्य सीटें रह जाएंगी जिन पर पुरूष या महिला कोई भी चुनाव लड़ सकेगा।

आरक्षण लागू नहीं होने से पहले लोकसभा की 545 सीटों में से 122 अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। आरक्षण लागू हो जाने पर इनमें से 40 सीटें महिलाओं के हिस्से जाएंगी और केवल 82 आरक्षित सीटों पर पुरूष या महिला कोई भी चुनाव लड़ सकेगा।

महिलाओं के लिए आरक्षित होने वाली लोकसभा की 181 सीटों में से वे 141 बिना आरक्षण वाली और 40 आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ सकेंगी। इसी तरह आरक्षण लागू होने पर विभिन्न विधानसभाओं की कुल 4109 सीटों में से 1167 अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए और 1370 महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी और 2942 सामान्य सीटें होंगी।

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