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10 दिसंबर, 2019|4:13|IST

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ब्लॉग-वार्ता : एक उम्र दरकार है

मकबूल फिदा हुसेन कतर के क्या हो गए, यहां उनका कतरा-कतरा किया जा रहा है। हिन्दी ब्लॉग जगत में हुसैन पर हंगामा मचा है। http://janatantra.com पर गिरिजेश लिखते हैं कि हुसेन चचा तुसी न जाओ। दूर रहने और नाता तोड़ने में बड़ा फर्क होता है। देखो, बिस्मिल्लाह खान को आईटीसी ने कोलकाता बुलाया वो बनारस छोड़ कर नहीं गए। गिरिजेश कहते हैं कि कुछ गड़बड़ियां तुमसे भी हो गईं। लिखते हैं, चचा तुम जुपिटर से नहीं आए थे। कैसे मान लिया जाए कि तुम्हारी समझ तुम्हें ये नहीं बताती थी कि ये जो तुम करने जा रहे इस पर बवाल मचेगा। इसीलिए जब तुम्हारे जैसे परिपक्व दिमाग ने जब हिन्दू देवी-देवताओं और भारत माता की नग्न तस्वीर बनाई तो तुम्हारी नीयत पर संशय हुआ।

गिरिजेश लिख रहे हैं कि चचा फैसला तुम्हारे हाथ में है। बस तुम चले मत जाना, तुम्हें हमारे देवी देवताओं की कसम। वर्ना, तुम्हारी भारत माता तुम्हें ताना देगी- ये क्या कि चंद ही कदमों में थक के बैठ गए, तुम्हें तो साथ मेरा दूर तक निभाना था।
http://ravikumarswarnkar.wordpress.com पर दिल्ली हाई कोर्ट का एक फैसला है। शीर्षक है- हुसेन की भारत माता पेंटिंग और अदालत का फैसला। आठ मई 2008 का दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला है। इसे पढ़ कर अदालत की नजर से हुसेन की चित्रकारी को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल विवेकानंद के एक कथन की मिसाल देते हैं। विवेकानंद ने कहा है कि हम हर किसी को अपने मानसिक विश्व की सीमा से बांधना चाहते हैं और उसे हमारे सिद्धांत, नैतिकता का बोध भी सिखाना शुरू कर देते हैं। सारे धार्मिक संघर्ष दूसरों के ऐसे मूल्यांकन की देन हैं। यह महत्वपूर्ण है कि दूसरों के दायित्वों को उनकी नजरों से देखा जाए और दूसरों के रीति-रिवाजों तथा प्रथाओं को हमारे मापदंडों से नहीं देखा जाए।

इसके बाद न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने संतुलन के साथ अपने फैसले का संदर्भ समझाया है। भारत माता की पेंटिंग के बारे में कहते हैं कि यदि पेंटिंग को संपूर्णता में देखा जाए तो साफ होता है कि प्रतिवादियों के वकील की जो दलील कि यह नग्न है, उसके विपरीत किसी भी देशभक्त भारतीय के मन में इसे देखकर घृणा का भाव नहीं उठेगा और न ही इसमें आंखों को चुभने वाली कोई चीज है जिसे नग्नता के रूप में अश्लीलता कहा जा रहा है, उसकी वजह से पेंटिंग में भौंचक्का कर देने वाला कलाबोध आ गया है, जबकि नग्नता इतनी गैर-महत्वपूर्ण हो गई है कि उसे आसानी से नजरअंदाज किया जा सकता है। इन तमाम दलीलों के सहारे न्यायमूर्ति हुसेन पर अश्लीलता फैलाने के आरोपों को निरस्त कर देते हैं।
सब अपने अपने तर्को को लेकर भड़के हुए हैं। http://www.pravakta.com पर विश्व हिन्दू परिषद का बयान छपा है। सुरेंद्र जैन कहते हैं कि हुसेन ने हिन्दू धर्म का अपमान करने के लिए कतर की नागरिकता ली न कि कला के सम्मान के लिए। सुरेंद्र जैन कहते हैं कि हुसेन को भारत आकर न्यायपालिका का सामना करना चाहिए। http://mireechika.blogspot.co पर चार्टर्ड अकाउंटेंट विजय प्रकाश सिंह लिखते हैं कि हमारे कई देवी-देवताओं और मूर्ति कला में ऐसे चित्रण हैं जिन्हें कोई नग्नता के रूप में देख सकता है लेकिन लाखों लोग उसे श्रद्धा की नजर से देखते हैं और उन्हें कभी नग्नता नजर नहीं आती। विजय प्रकाश सिंह लिखते हैं कि हुसेन ने एक फिल्म बनाई जिसका एक गाना था नूर अल नूर। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इसका विरोध किया तो हुसेन ने फिल्म ही वापस ले ली लेकिन गाना नहीं हटाया। हुसेन ने कहा था कि उनकी मर्जी। कट्टरपंथी इसका भी इस्तमाल करते हैं और कहते हैं कि मुसलमानों ने एक शब्द का मामला उठाया तो फिल्म ही वापस ले ली। हमें दोनों तरफ के अतिवादियों से बचना होगा। विजय प्रकाश सिंह इस बात पर अफसोस जाहिर करते हैं कि हुसेन ने लड़ाई छोड़ दी।

http://mohallalive.com पर हुसेन के इंटरव्यू का हिन्दी रूपांतरण छपा है। एनडीटीवी की बरखा दत्त के जवाब में हुसेन कहते हैं कि चालीस साल का होता तो लड़ाई करता लेकिन मैं अपने तीन प्रोजेक्ट को पूरा करना चाहता हूं। मैं भारतीय सिनेमा के सौ साल और मोहनजोदड़ों से लेकर मनमोहन तक की यात्रा को कैनवास पर उतारना चाहता हूं। ये सरहदें केवल राजनीति की सरहदें हैं। आप कहीं भी रह कर काम करो, उसकी जड़ें पांच हजार साल के महान भारतीय इतिहास से खुद-ब-खुद जुड़ जाती हैं। बरखा के सवाल में हुसेन कहते हैं कि तू कहे तो उन्वान बदल दूं लेकिन एक उम्र दरकार है अफसाना बदलने के लिए।

ravish@ndtv.com
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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