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17 नबम्बर, 2019|7:41|IST

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घोड़ी की पीठ

मौलाना की सफेद दाढ़ी होली के गुजरे हुए गुलाल से अभी तक हल्की गुलाबी थी। मुझे दो इलायचियां पेश करते हुए बोले- ‘भाई मियां आज एक हिकायत (लघुकथा) याद आ रही है। एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन अपनी घोड़ी पर बैठे कहीं जा रहे थे। सिर पर एक भारी गठरी उठा रखी थी। किसी ने सुझाया कि गठरी घोड़ी की पीठ पर क्यों नहीं रख देते। मुल्ला बोले- मैं इतना जालिम नहीं हूं। घोड़ी के पेट में बच्चा है। मैं उस पर ज्यादा बोझ नहीं लादना चाहता।’
मौलाना ने इलायची मुंह में घुमाई और आईपीएल से बाहर हो चुके पाकिस्तान की तरह दुखी स्वर में बोले- ‘जो हाल मुल्ला की गठरी का सो महंगाई का। बजट ने चार ईंटें और लाद दी हैं कि जहां इतना झेला.. और झेलो। महंगाई तो गरीब की जोरू है। सरकार कहती है कि इसका बोझ हमारे ऊपर है। थोक वाला गाल बजाता है कि महंगाई का बोझ हम पर है। रिटेल वाला माथा कूटता है कि महंगाई ने हमें पीस डाला। सेल में स्लम्प आ गया है। हकीकत यह है कि सारा आटा आम आदमी का गीला हो गया है। तन की लंगोटी सिकुड़ कर और छोटी हो गई है। तीज त्योहार दर्द और दोगुना कर देते हैं। बकौर शायर- ‘उड़ाई इस कदर की धज्जियां हैं दर्दे पैहम ने.. कि अपनी नार (बीवी) है और आप पहचानी नहीं जाती।’ भाई मियां, जनता तो घोड़ी की पीठ है। लादे जाओ, लादे जाओ और यह भी कहते जाओ कि गठरी का बोझ तो हमारे सिर पर है। ऊपर से तीर चुभता है जब कोई पार्टी वाला अपने भरे हुए गाल बजा कर कहता है कि हम गरीबी दूर करेंगे। खुशहाली लाएंगे। कद्दू लाओगे। जो आया वह मुर्दे की छाती पर एक और पत्थर रख कर चला गया। आईपीएल खेलो.. ओलंपिक सजाओ.. भाड़ में गई रोटी, नमक, तेल।

 

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