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19 नबम्बर, 2019|10:25|IST

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मौलिक पहचान खोता उत्तराखंड

पर्यावरण प्रदूषण तथा ग्लोबल वार्मिग के खतरे से बचने के लिए वनों का व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध रूप से संरक्षण तथा संवर्धन बेहद जरूरी है। उत्तराखंड जो अपनी ऊंची बर्फीली चोटियों तथा हरियाली के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध था, धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है। अगर व्यापक शोध तथा विश्लेषण किया जाए तो साफ पता चलेगा कि राज्य गठन के बाद यहां के वनों में कमी आयी है। देहरादून में तथा दिल्ली में बैठे रहनुमाओं को यह सब नजर नहीं आता। वातानुकूलित कल्चर के राजनेता और नौकरशाह आम आदमी की दुश्वारियों से अनजान हैं। लगता है हमारी सरकारों ने प्रतिज्ञा कर ली है कि वे पर्यावरण के विविध रंगों से सजे राज्य को भवनों तथा फैक्ट्रियों का प्रदेश बनाकर छोड़ेंगे। हमारे नीति-निर्माताओं ने ठान ली है कि वे जल, जंगल, जमीन को खत्म करके ही दम लेंगे। पूंजी को खायेंगे, पूंजी को पियेंगे तथा पूंजी में सोयेंगे।
शंकर प्रसाद तिवारी, रुद्रप्रयाग

पत्रकारिता की भूमिका
आज का युग मीडिया का युग है। किसी भी राष्ट्र के उत्थान व पतन में मीडिया का बहुत बड़ा हाथ रहा है। जब भारत परतंत्र था, तब राष्ट्रहित चाहने वालों ने समाचार पत्रों के माध्यम से स्वतंत्रता का बिगुल फूंका। विचारों के प्रवाह से लोग एक-दूसरे के सम्पर्क में तेजी से आने लगे तथा बड़े-बड़े आन्दोलन हुए जिससे अन्तत: भारत को स्वतंत्रता मिली। देश को आजाद करवाने में पत्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उस समय के पत्रकार किसी नायक से कम नहीं थे। आज भी ऐसे अनेक पत्रकार हैं जो राष्ट्रीय हित व जनकल्याण चाहते हैं, किन्तु कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो मात्र कुछ रुपयों के लिये पत्रकारिता से खिलवाड़ कर रहे हैं। पत्रकारिता से ही देश एकजुट व जागरूक होता है, इससे पत्रकारों की राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है। इन्हें राष्ट्रहित के साथ आम आदमी के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति भी सजग रहना चाहिए।
प्रीतिराज, लखस्यार, देहरादून

लापरवाही का शिकार गांधी पार्क
गांधी पार्क की स्थापना स्थानीय जन को बेहतर वातावरण प्रदान करने को की गई थी, लेकिन पार्क के मौजूदा हालात देखकर ऐसा तो नहीं लगता। साफ-सफाई का कुछ पता नहीं, झूलों के नाम पर केवल डंडे खड़े हैं। गांधी पार्क असामाजिक तत्वों का अड्डा बनकर रह गया है। रही सही कसर हड़ताल व धरना-प्रदर्शन करने वालों ने पूरी कर दी है। इस पार्क का नाम गांधी पार्क से बदलकर धरना पार्क रख देना चाहिए। नगर निगम का बोर्ड लगाने से निगम की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। मेयर सड़कों के सौन्दर्यीकरण की बात कर रहे हैं, लेकिन जिस स्थान पर सुधार की जरूरत है वह कार्य क्यों नहीं करते।
प्रतिभा कन्नौजिया, देहरादून

सड़क चौड़ीकरण को कटते वृक्ष
सड़क चौड़ीकरण के चलते आज सड़क किनारे कई हरे वृक्षों को काटने का कार्य जारी है। हरियाली प्रदेश का दावे करने वाली हमारी सरकारें इन वृक्षों के एवज में वृक्षों को लगाने के प्रति सुस्ती अपनाए हुए हैं। चार धाम यात्रा के दौरान तपते पहाड़, तपती सड़कें, सूखे जलस्नोत और हरियाली से हीन ये पहाड़ की सड़कें भला किस हरियाली प्रदेश की तस्वीर दिखायेंगी। आज इन सड़कों के किनारे की खिसकती-सरकती मिट्टी में शीघ्र चौड़े पत्तेदार और जल्दी बढ़ने वाले वृक्षों को आरोपित किया जाना चाहिए। जिस संस्था को सड़क निर्माण का कार्य दिया जाता है, उसी को पौधारोपण का काम भी सौंपा जाना चाहिए तभी हमारे पहाड़ों की हरियाली और खूबसूरती पर चार चांद लगेंगे। यदि समय रहते सुध न ली गई तो जल परियोजनाओं के नाम पर व सड़क निर्माण के नाम पर कटते हरे वृक्षों का खामियाजा सबको भुगतना पड़ेगा।
अश्विनी गौड, अगस्त्यमुनि

केन्द्र के सामने कांग्रेस लाचार
पांच सांसद कांग्रेस के जीतने के बाद भी उत्तराखंड की कांग्रेस केन्द्र के सामने लाचार खड़ी है। रेल बजट के बाद आम बजट में भी उत्तराखंड के हाथ निराशा ही लगी। भाजपा के साथ पूरा विपक्ष आम जनता के पक्ष में खड़ा दिखा। राज्य के औद्योगिक पैकेज की अवधि पर निर्णय न लेना हमारे सांसदों की लाचारी दिखाता है। केन्द्र सरकार में राज्य मंत्री का दायित्व निभाने वाले हरीश रावत जी पर सवाल खड़े हो सकते हैं, क्योंकि यह मामला सत्ता पक्ष या विपक्ष का नहीं वरन् उत्तराखंड की जनता का है और इन्हें जवाब देना ही होगा। राज्य के विकास का मुद्दा प्रमुख है। सांसद या मंत्री का काम राज्य के लिये विकास योजनाओं को शामिल करवाना होता है अपना कार्यकाल काटना नहीं।
पूरन चन्द्र पाण्डे, रामनगर, नैनीताल

यह कटौती गलत है
जब कभी किसी बुजुर्ग की आय केवल ब्याज से होती है और जब यह ब्याज साढ़े तीन लाख हो तो स्नोत पर कर कटौती (टीडीएस) लागू हो जाती है जो लगभग 39000 रुपए होती है। यदि आय 2.50 लाख है तो टीडीएस बनेगा 28000 रुपए, पर आयकर शून्य। उपरोक्त वर्गो पर टीडीएस समाप्त करना तर्कसंगत है। ब्याज आय वाले ज्यादातर बुजुर्ग-महिलाएं ही होते हैं यही सुरक्षित निवेश में विश्वास रखते हैं। अत: यह टीडीएस प्रणाली उपरोक्त वर्ग पर समाप्त हो।
हरिओम मित्तल, हरिद्वार

 

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