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प्रतिबंधों में छिपी उम्मीदें

किसी देश के अनुचित आचरण के बाद युद्ध के विकल्प के रूप में उस पर कारोबारी बंदिशें या प्रतिबंध लगाने की परंपरा काफी पुरानी है। प्रतिबंध शांति की राह प्रशस्त कर सकते हैं। ये इस भरोसे के साथ लगाए जाते हैं कि जिस देश पर प्रतिबंध लगा है, वहां की जनता भी अपने नेताओं से सद्व्यवहार की अपेक्षा करेगी और वह प्रतिबंधों को एक अवसर पर तौर पर लेगी। बीते दो मार्च को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने एकमत से उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों को और सख्त करने पर सहमति जताई। इसकी वजह यह है कि इस मुल्क ने परमाणु हथियार और लंबी दूरी के मिसाइलों का परीक्षण किया है। उम्मीद है कि उत्तर कोरिया की समझदार जनता अपने नेता किम जोंग उन से अपना रवैया बदलने की मांग जरूर करेगी। पिछले प्रतिबंधों से ऐसा संभव नहीं हो सका था। मगर इस बार चीन की नाराजगी और आर्थिक शिकंजा कसने के कारण विश्व बिरादरी से अलग-थलग पड़े इस देश की नीतियां बदल सकती हैं। इसके उलट, कम्युनिस्ट शासन वाले क्यूबा पर शीत युद्ध के समय लगे प्रतिबंधों में ढील देने की कोशिश राष्ट्रपति ओबामा कर रहे हैं। यहां तक कि वह मार्च में अंत में वहां का जाने भी वाले हैं, ताकि दोबारा शुरू हुए आधिकारिक संबंधों को मजबूत बनाया जा सके। ओबामा का दावा है कि क्यूबा में बदलाव की गति को तेज करना है, तो उसके साथ आर्थिक साझेदारी बढ़ानी होगी। मगर क्या वह सच साबित होंगे? चीन और वियतनाम के साथ साझेदारी बढ़ाने के बावजूद वहां मानवाधिकारों में बहुत मामूली सुधार हो सका है। हालांकि सच यह भी है कि म्यांमार के सैन्य तानाशाह प्रतिबंधों की वजह से ही लोकतंत्र का दरवाजा खोलने को बाध्य हुए, और दक्षिण अफ्रीका व जिम्बाॠब्वे में अल्पसंख्यक गोरों का राज खत्म हुआ। वैसे प्रतिबंधों के प्रभावहीन होने के भी कई उदाहरण हैं, जैसे कि क्रीमिया पर कब्जा करने और पूर्वी यूक्रेन में सैन्य दखल की वजह से रूस पर लगा प्रतिबंध। फिर भी प्रतिबंध की नीति मूल्यवान है, जिसकी कीमत ईरान में दिखती है, जहां सरकार पर घरेलू दबाव बढ़ने तक का इंतजार किया गया, और नतीजा सकारात्मक रहा।   
क्रिश्चियन साइंस मानिटर, अमेरिका

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