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कब्ज से परेशान हैं, सूर्य नमस्कार करें

कब्ज पाचन प्रणाली से संबंधित बीमारी है। आंतों के कमजोर होने से शरीर के ठोस मल का बाहर निकलना धीमा हो जाता है जिस कारण शरीर में विषैले पदार्थ इकट्ठा होने लगते हैं और अंतत: शरीर रोगों से घिर जाता है। कुछ आसन, योग आदि की सहायता से आप इससे पूरी तरह मुक्त रह सकते हैं।

आधुनिक जीवनशैली कब्ज रोग का प्रमुख कारण है। शारीरिक परिश्रम की कमी, कुर्सी पर ज्यादा देर तक बैठना, व्यायाम एवं योग न करना, आहार संबंधी गलत आदतें, कमोड टॉयलेट का प्रयोग, बढ़ता मानसिक तनाव आदि वे प्रमुख कारण हैं जो कब्ज के लिए जिम्मेदार हैं। यौगिक क्रियाओं के नियमित अभ्यास तथा आहार में परिवर्तन से जीर्ण से जीर्ण कब्ज को भी ठीक किया जा सकता है।

सूर्य नमस्कार
प्रतिदिन दस से बारह आवृत्तियों का अभ्यास करने वाला व्यक्ति कब्ज की समस्या से पूर्णतया मुक्त हो सकता है। किंतु, नये अभ्यासियों को प्रारंभ दो आवृत्तियों से करना चाहिए तथा धीरे-धीरे प्रति सप्ताह एक आवृत्ति अभ्यास में बढ़ाते जाना चाहिए। उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, टीबी तथा स्पांडिलाइटिस के रोगी को इसका अभ्यास योग्य मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

आसन
कब्ज से पीड़ित लोगों को जानुशिरासन, उष्ट्रासन, कौआ चाल, उदराकर्षण आसन, तिर्यक ताड़ासन, करिचक्रासन तथा हलासन का अभ्यास करना चाहिए। इसके साथ ही पवनमुक्तासन के 5 से 7 चक्रों का अभ्यास  करने से बहुत लाभ होता है। प्रतिदिन भोजन के बाद 5 से 7 मिनट वज्रासन पर अवश्य बैठें।

ताड़ासन की अभ्यास विधि
दोनों पैरों के बीच 4-6 इंच का अंतर कर खड़े हो जाइए। दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में गूंथिये (इंटरलॉक) और उन्हें सिर से ऊपर सीधा उठाइए। अब एड़ियों को भी जमीन से ऊपर उठाइए। इसके पश्चात्, शरीर को दायीं तथा फिर बायीं ओर बारी-बारी से 8 बार झुकाइए। इसके बाद, वापस पूर्व स्थिति में आ जाइए।

प्राणायाम
प्रतिदिन भस्त्रिका का लगभग 5 से 7 मिनट अवश्य अभ्यास करें। साथ में, नाड़ी शोधन तथा सूर्यभेदी प्राणायाम के नियमित अभ्यास से इस रोग को जड़ से उखाड़ फेंकने में मदद मिलती है।

सूर्यभेदी प्राणायाम की अभ्यास विधि
ध्यान के किसी भी आसन जैसे पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन में या कुर्सी पर रीढ़, गला व सिर को सीधा कर बैठ जाइए। नासिकाग्र मुद्रा लगाइए। बायीं नासिका को बंद कर दायीं नासिका से गहरी तथा दीर्घ श्वास अंदर लीजिए। इसके बाद बायीं नासिका से दीर्घ तथा गहरी श्वास निकालिए। यह सूर्यभेदी प्राणायाम का एक चक्र है। 5 या 6 चक्रों से प्रारम्भ करें और 24 तक अभ्यास करें।

सावधानी
उच्च रक्तचाप, हृदय रोग तथा हायपरथायराइड से ग्रस्त लोग इसका अभ्यास न कर सामान्य नाड़ी शोधन का अभ्यास करें। अन्य लोग, गर्मी के मौसम में इसके अभ्यास के बाद चन्द्रभेदी या शीतला प्राणायाम का अभ्यास करें।

वटक्रिया: हठयोग की एक महत्वपूर्ण क्रिया-शंख प्रक्षालन का योग्य मार्गदशन में हर छह महीने में एक बार अवश्य करें।

ध्यान: मानसिक तनाव आज की शहरी जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह कब्ज को और जीर्ण करता है। ध्यान या योगनिद्रा का नियमित अभ्यास करने से सारे तनाव भाग जाते हैं और मन  प्रसन्न, मुक्त तथा हल्का हो जाता है।

आहार
अपने दैनिक जीवन में  प्रतिदिन फल, सब्जी तथा अनाज को उचित अनुपात में जोड़ लेना चाहिए।  सूखे मेवे जैसे अंजीर और आलू बुखारा का भी सेवन करना चाहिए। चोकर मिले आटे की रोटी एवं जौ-चना मिश्रित आटे की रोटी अवश्य अपने भोजन में शामिल करें।

अन्य सुझाव
आंतों की आदत बनाने के लिए निश्चित समय पर शौच जाएं।
प्रात: शौच जाने के पूर्व मुंह साफ कर एक या दो गिलास पानी अवश्य पियें।

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