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कौन मनाएगा होली, कौन सहेगा सियासी वनवास

उत्तर प्रदेश के चुनावी इम्तिहान के नतीजों की घड़ी नजदीक आने के साथ ही अपने जीवन की निर्णायक राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे कई सियासी नेताओं और उनकी पार्टी के प्रत्याशियों की तेज होती धुकधुकी के बीच लाख टके का सवाल यह है कि कौन होली मनाएगा और किसे मिलेगा सियासी वनवास।

बेशक, उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के चुनाव कई राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं के लिये साख का सवाल हैं। इन दलों में कांग्रेस, भाजपा, सपा और सत्तारूढ़ बसपा भी शामिल है। मतगणना के दूसरे ही दिन होली का त्यौहार है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि लोकतंत्र के पर्व में होली का रंग किस पर बरसेगा।

कहना गलत नहीं होगा कि ये चुनाव कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के लिये इज्जत का सवाल हैं और बिहार के कड़वे अनुभव के बाद उत्तर प्रदेश के चुनाव में राहुल अपना जीवट साबित करने की उत्कंठा लेकर उतरे थे और लोगों के जेहन में यह बात छप सी गयी है कि निश्चित रूप से इस चुनाव के नतीजों से राहुल की सियासी क्षमता का आकलन हो जाएगा।

सपा के लिये भी राज्य विधानसभा चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न हैं। बाबरी मस्जिद विध्वंस के जिम्मेदार माने जाने वाले कल्याण सिंह को गले लगाने की कीमत वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में मुसलमानों की नाराजगी के रूप में चुकाने वाली यह पार्टी इस बिरादरी से माफी रूपी डैमेज कंट्रोल के बाद विधानसभा चुनाव लड़ रही है। अब मुसलमानों ने सपा को किस हद तक माफ किया है, यह कल चुनाव नतीजे आने के बाद साफ हो जाएगा।

वर्ष 2007 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में जनता की नाराजगी से बेजार भाजपा के लिये कल के नतीजे कितने मायने रखते हैं, यह उसके नेताओं से बेहतर शायद ही कोई जान सकेगा।

विधानसभा चुनाव से करीब डेढ़ माह पहले तक सबसे बेदाग पार्टी दिख रही भाजपा ऐन वक्त पर राज्य में हजारों करोड़ रुपये के एनआरएचएम घोटाले के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगाकर अपनों की ही आलोचना से घिर कर मुसीबत में फंस गयी।

भाजपा हमेशा कहती रही कि उसने जातिवाद आधारित राजनीति वाले इस राज्य में जातीय समीकरणों को साधने मात्र के लिये कुशवाहा को पार्टी में लिया। अब उसकी इस दलील को जनता ने किस ढंग से समझा, यह भी कल जाहिर हो जाएगा।

पिछले विधानसभा चुनाव में 206 सीटें लेकर पूर्ण बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हुई बसपा इस चुनाव में अपने ताज को बरकरार रखने के दावे कर रही है लेकिन भ्रष्टाचार के नये-नये तरीके ईजाद करने और खराब कानून व्यवस्था के आरोपों से घिरी इस पार्टी पर अब जनता को कितना विश्वास रह गया है, यह भी कल पता लग जाएगा।

राज्य में वर्चस्व के बजाय कमोबेश वजूद की लड़ाई लड़ रही सियासी पार्टियों ने सात चरणों में हुए विधानसभा चुनाव के प्रचार में अपनी पूरी ताकत क्षोंक दी और जनता ने भी अभूतपूर्व उत्साह दिखाते हुए प्रदेश के चुनावी इतिहास में सबसे ज्यादा 59 फीसदी मतदान भी किया। अब देखना यह है कि कल उंट किस करवट बैठता है।

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