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...और भैय्या से अध्यक्षजी बन गए अखिलेश

गए साल का सितंबर महीना और 12 तारीख। समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय पर खासी गहमा-गहमी। मुख्यालय के परिसर में एक रथनुमा बस। पार्टी की युवा ब्रिगेड के उत्साही कार्यकर्ता। बगल में बने छोटे से मंच पर पार्टी के तमाम दिग्गज नेता। मुलायम सिंह यादव से लेकर आजम खां तक। एक चेहरा और.। अखिलेश यादव का। मंच पर सामने की ओर आने की हिचक। शोर मचाते फोटोग्राफर.अरे भैया सामने आइए.फोटो नहीं बन पा रही अच्छी।

शोर-शराबे और भीड़-भड़क्के में ही मंच से घोषणा समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव समाजवादी क्रांति रथ यात्रा शुरू कर रहे हैं। चुनावों तक चलेगा यह। जब तक बसपा की सरकार को हटा नहीं लेगी सपा... वगैरह। मुलायम और आजम ने हरी झंडी दिखाई और अखिलेश रथ पर सवार हो गए। साथ ही शुरू हो गई उनके सियासी कैरियर की सबसे जिम्मेदारी भरी यात्रा जो पार्टी के चुनावी भविष्य के साथ ही सपा के भीतर और बाहर अखिलेश की नेतृत्व क्षमता का अहम पैमाना भी बनने जा रही थी। इसलिए भी क्योंकि 2007 के चुनाव में अखिलेश सपा के युवा संगठनों के राष्ट्रीय प्रभारी भर थे और 2009 में लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलने के कारण चुनावों में वे पहले कभी कसौटी पर नहीं कसे गए थे।

सितंबर की उस दोपहर और उसके बाद के छह महीनों में काफी कुछ बदल चुका है। अखिलेश यादव न सिर्फ समाजवादी पार्टी का चेहरा बनकर उभरे हैं बल्कि पूरी पार्टी उनकी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। अखिलेश आज जहां खड़े हैं वह मुकाम उन्हें उतनी आसानी से नहीं मिला। उनके साथ समाजवादी क्रांति रथ यात्रा में लंबा सफर कर चुके पार्टी के एक युवा पदाधिकारी के शब्दों में, ‘भैया बेहद ठंडे दिमाग के हैं। चाहे कोई परिस्थिति हो वे बेहद शांत रहना जानते हैं। ’ 

लखनऊ से शुरू हुई अखिलेश का क्रांति रथ यात्रा को करीब से देखने वाले गवाह हैं कि कैसे पहले से तय सभाओं के अलावा अखिलेश ने रास्ते में जहां भी झुंड बनाए लोग देखे, वहां रुक कर उन्हें संबोधित करने को नियम सरीखा बना लिया था। भले ही तय कार्यक्रम में देरी ही क्यों न हो और तपे-तपे नेता नाक भौं सिकोड़ें कि इतनी देर से जाने पर वहां कोई मिलेगा नहीं। लेकिन अखिलेश जानते थे कि सभाओं से अलग सड़क किनारे खड़ी भीड़ से संवाद बेहद जरूरी है।

उस यात्रा के दो महीने भर के भीतर ही संकेत मिलने लगे थे कि अखिलेश कुछ तय करके उतरे हैं। कई जगहों पर वे दोबारा भी पहुंचे और वहां पिछली बार उन्हें भैया कहने वाले युवा कार्यकर्ता या बड़ी पीढ़ी वाले जो उन्हें नाम से संबोधित करते थे वैसे खुर्राट नेता भी उन्हें अध्यक्ष जी कहने लगे थे। अब तक नमस्ते करने वाले हाथ, पैर छूने या गले लगाने लगे थे। दिसंबर के अंत में चुनावों की घोषणा तक अखिलेश ने सपा को चुनाव में मजबूती से उतार दिया था।

जनवरी के पहले सप्ताह में अखिलेश ने जब बाराबंकी में मीडिया के सवालों के जवाबों में बेलाग कहा कि बाहुबली डीपी यादव जैसे लोगों को सपा में नहीं लिया जाएगा तो लगा पार्टी का कायाकल्प हो रहा है।
कानून-व्यवस्था बिगाड़ने का अभिशाप ढो रही पार्टी का नेता दागियों के खिलाफ बोल रहा है। कई लोग मानते हैं कि अखिलेश का वह रुख खुद उनके और सपा के लिए भी टर्निग प्वांइट बनकर आया। उसके बाद लैपटाप और टैबलेट देने सरीखे हाई-टेक वादों को घोषणा पत्र में शामिल करवाकर भी अखिलेश ने पार्टी का चेहरा बदलने की अपनी कवायद को जारी रखा।

सपा के अंदर कई लोग हैं जो मानते हैं कि अखिलेश अपने बूते छह महीने के बीतर सेलिब्रिटी बन गए हैं। और अखिलेश वह खुद क्या आकलन कर रहे हैं अपना? प्रचार के आखिरी दिन रुहेलखण्ड में और दिनों की तर्ज पर ही कई सभाएं करने और बरेली में तो पदयात्रा और साइकिल यात्रा भी करने के बाद अखिलेश बोले, मैंने तो अपना काम किया अब बस! फैसला जनता करेगी।

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