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रामपुर में बिना टिकट का सिनेमा

रामपुर लाइव 
कभी नाव गाड़ी पर, तो कभी गाड़ी नाव पे। सूबे की सबसे दिलचस्प लड़ाई से रूबरू रामपुर सीट पर यह कहावत फिलवक्त एकदम सटीक बैठ रही है। कभी जयाप्रदा को लोकसभा तक न पहुंचने देने के लिए आजम साहब ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। अब बारी है जयाप्रदा की। वह उनके विधानसभा पहुंचने के रास्ते में अपने तईं जितने भी कांटे हो सकते हैं, बो रही हैं। जयाप्रदा अपने प्रत्याशी रेशम अफरोज के लिए गली-गली वोटों के लिए आंचल फैला रही हैं। सीधे आजम को निशाने पर नहीं लेती पर उनके मकसद से रामपुर अनजान नहीं।

अमर सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकमंच की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व रामपुर की सांसद जयाप्रदा को वोटों से बाल्टी भरने की फिक्र से ज्यादा चिंता इस बात की है कि सपा के आजम साहब की ‘साइकिल’ पर सवारी गांठने वाले वोटों को लग्घी मार के कैसे गिराया जाए। पर आजम पुराने खिलाड़ी हैं। उनके निशाने पर जयाप्रदा हैं ही नहीं, वह सीधे अमर सिंह को निशाने पर लेते हैं तो जयाप्रदा भी सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव पर हमला बोलती हैं। आजम कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. तनवीर को निशाने पर लेते हैं लेकिन बीच में आती हैं जयाप्रदा यह कहते हुए कि आजम को मैंने भाई बनाया लेकिन उन्होंने मेरी मुखालिफत की।

रामपुर का महासमर फिलवक्त जयाप्रदा और आजम के बीच जाती लड़ाई में तब्दील है। जिसमें एक्शन, ड्रामा और इमोशन सभी कुछ अपने शबाब पर है। लेकिन यहां के वोटरों को भी खूब पता है कि रामपुर की लड़ाई का यह खास चुनावी राग बनता जा रहा है जो प्रचार के दौरान अपने तय वक्त पर ही बजता है। भाजपा ने यहां पर जागेश्वर दयाल दीक्षित तो बसपा ने भारत भूषण गुप्ता को उतारा है।

सिविल लाइंस, सुबह 09.00 बजे
शकील कहते हैं, ‘मजा आ रहा है। वैसे बाल्टी मजबूत लड़ाई में है नहीं। साइकिल से लड़ेगा तो पंजा ही। डॉक्टर साहब को कम मत समझिए। डॉ. तनवीर अपने नर्सिग होम में गरीबों का मुफ्त इलाज करते आए हैं। खेलते भी थे तो उनका संपर्क ज्यादातर पढ़े-लिखे लोगों में है। वैसे अगर महंगाई के चलते जनता कांग्रेस से फिरंट न हो तो सीट निकल सकती है।’ पान खा रहे मिर्जा असलम मुंह में करीने से पान दबा कर कहते हैं-बिना टिकट का सनीमा समझिए। परसों जयाप्रदा ने यहीं नुक्कड़ पर सभा की थी। अपना दामन फैला के बोलीं- मेरा आंचल वोटों से भर दो। फिर मंच पर रखी बाल्टी उठा कर उसे वोट से भरने की गुजारिश की। सपा के खिलाफ बोलती हैं तो उनकी आंखें तक भर आती हैं।

आफरीदी बाग, 11.00 बजे
चुनाव भले आजम खां लड़ रहे हों लेकिन उनके साथ जयाप्रदा, अमर सिंह का नाम जरूर आ रहा है। आफरीदी वजाहत खां कहते हैं-जयाप्रदा यहां रेशम की ज्यादातर नुक्कड़ सभाओं में पहुंच रही हैं। भावुक बातें कर रही हैं।  हालांकि आजम सात बार जीत चुके हैं इसलिए उन्हें हराना इतना आसान नहीं। इस बार लगता है मुश्किलात आ रही हैं क्योंकि आजम सपा प्रत्याशियों के लिए वोट मांगने रामपुर से बाहर ज्यादा नहीं गए। आजम खेमे के युद्ध वीरों को पता है कि रामपुर की सियासत उन्हीं की देहरी से शुरू होती है और वहीं आकर खत्म होती है। फिर भी वह इत्मीनान से नहीं बैठे हैं। सभा, संपर्क और दौड़-भाग में कहीं कोई कमी नहीं है।

नूर महल के आसपास, 12.00 बजे
नूर महल से 100 गज दूर लगे एक छोटे से मजमे की सियासी चकल्लस में डॉक्टर साहब की जय है। उनकी नफीस-सी जिरह में महल के पूरे समर्थन की बातें हैं। एक कहता है-डॉक्टर साहब भी चुप नहीं बैठे हैं। उनका जुड़वा भाई भी पूरी ताकत झोंके है। शक्ल एक जैसी तो समय का पूरा सदुपयोग कर रहे हैं दोनों। बेगम साहिबा का हाथ भी है उन पर। दूसरा बात बीच में काट देता है -बाल्टी से उनको बड़ी आस है। आजम के वोट बाल्टी काट दे तो उनका काम आसान हो जाएगा।

पिण्डरा किले के पास मोती मस्जिद, 01.30 बजे
यहां भी चर्चा में जयाप्रदा की चुनावी सभाएं। अकील बताते हैं- जयाप्रदा के लिए 2014 का चुनाव निकालना मुश्किल हो गया। रेशम अफरोज जीतने वाली नहीं। जयाप्रदा की अपनी पोजीशन खराब हो रही है। अलबत्ता उन्होंने कांग्रेस के राह में कांटे बो दिए हैं। दूसरा तबका मानता है कि आजम के वोट कटेंगे। आजम से लोग नाराज हैं। वोट बंट जाएगा अबकी।

हामिद स्कूल के पास, 02.20 बजे
वोटर बेलाग है। बेधड़क है। हारून रशीद कहते हैं-वह 2009 का हिसाब चुकता करना चाहती हैं। और अपने इस काम में वह इतनी संजीदगी से जुटी हैं कि उनके हाव-भाव देख कर लगता है कि रामपुर में कहीं कुछ अजूबा न हो जाए। लेकिन होना मुश्किल है। यहां के वोटर को भी इस दिलचस्प मुकाबले में मजा आने लगा है। चर्चा में डॉ. तनवीर का समाजसेवा का जज्बा है तो आजम की अकड़ की बातें भी हैं। इत्तेफाक भी ऐसा कि दोनों ही जेल रोड पर रह रहे हैं।

बावनपुरी, 03.00 बजे
चाय की दुकान पर पसरी धूप में सुस्ता रहे सुरेश कहते हैं-कोई हल्के में न ले ठाकुर (अमर सिंह) साहब को। पुराने खिलाड़ी हैं। उनसे बेहतर सेटिंग कौन जानता है। तो उनके बगल में बैठे सलीम कहते हैं-अजीब है न कि कांग्रेस से अफरोज आलम और सपा से मो. आजम आधा दजर्न से ज्यादा चुनावों में आमने-सामने रहे हैं, देखिए इस बार अफरोज की जगह उनकी बेगम मो. आजम के सामने हैं। तनवीर कहती हैं कि मोहज्जब (पढ़े-लिखे) लोग कांग्रेस के साथ हैं। कम पढ़े-लिखे आजम के साथ।

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