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मुद्दा नहीं बना पीतल नगरी का विकास

जाति-धर्म और आरक्षण पर खूब हो रही चर्चा, सियासी बयार से गायब हैं युवाओं-महिलाओं और किसानों के मुद्दे

चुनावी महासमर के चक्रव्यूह का सातवां और अंतिम द्वार। इस द्वार का तोड़ने के लिए राजनीतिक महारथियों का जमावड़ा लगा हुआ है। मुस्लिम मतदाताओं के रुख का बैरोमीटर माने-जाने वाले इस क्षेत्र में दलों के मुद्दे कुछ तीखे भी हुए हैं और बदले भी हैं। जातिधर्म की खुलेआम बात हो रही है, अल्पसंख्यक आरक्षण को लेकर तीखे हमलों का दौर जारी है पर आम आदमी के मुद्दे इस सियासी बयार में कहीं मौजूद नहीं हैं।

नौ सीटों वाले मुरादाबाद जिले का सियासी भूगोल नया जिला भीम नगर बनने के बाद जरूर बदल गया है लेकिन यहां कुछ चीजें बरसों से जस की तस हैं। छह विधायक चुनने जा रहे जिले में समस्याओं की कमी नहीं है। शहर में जाम की समस्या है तो गांव में रहने वाले लोग सड़कों से परेशान हैं। किसानों को बिजली और बीज की दरकार है तो पूर्व मंत्री का इलाका कुंदरकी का नकटपुरी कला बिजली को तरस रहा है। शुरुआत शहर से करते हैं।

सुबह 9.30: टाउन हाल चौराहा
पुलिस बूथ के पास दुकान पर बैठे अयूब और रामेन्द्र गुप्ता अखबार की सुर्खियां देख रहे हैं। रैली और चुनाव सभाओं की खबर पढ़ने के बाद अयूब के मुंह से निकला-‘चोर हैं सबके सब’। बस यहीं से शुरू हो गया बहस का दौर। इनकी यह बातें नेताओं के वादों और दावों की हवा निकाल देती हैं कि नेता वोट मांग रहे हैं या डरा रहे हैं। शहर का दिल कहे जाने वाले टाउनहाल में सुबह के दस बजे रौनक आम दिनों जैसी ही हैं। चौमुखापुल और गुरहट्टी की ओर से वाहनों की रेलमपेल के यहां के दुकानदार आदी हो गए हैं। बुध बाजार इंपीरियल तिराहे की ओर निगाह डालो तो जाम दिखने लगता है। जीएमडी रोड भी खाली नहीं है।

आगे मुलाकात हुई व्यापारी नेता गिरीश भंडूला से। वे कहते हैं,सड़कें बनीं मगर ट्रैफिक नहीं सुधरा। ब्रास सिटी के दस्तकारों को सबने छला है। पांच लाख दस्तकार, 40 हजार कारखानेदारों के लिए एक भी मेडिकल कॉलेज नहीं। अच्छी तालीम को यूनिवर्सिटी नहीं है। आजम अंसारी बताते हैं दस्तकारों के लिए हैंडीक्राफ्ट डेवलेपमेंट मार्केटिंग सेंटर 1968 में बना था, 1977 में बाराबंकी में शिफ्ट कर दिया गया। एक डिजाइन सेंटर भी बना लेकिन दिल्ली के ओखला में शिफ्ट कर दिया गया। ऐसे में एक्सपोर्ट में भला क्या नए प्रयोग हो सकते हैं। शहर विधान सभा क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या जाम और बिजली है। लोकोपुल के जाम में फंसे बुद्धि विहार के आटा व्यवसाई सुबोध गुप्ता कहते हैं कि ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब जाम से नहीं जूझना पड़ता। शहर का ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त नहीं है। बिजली कम मिलती है।

12.30 बजे: देहात विधान सभा
कांठ हरिद्वार मार्ग से स्टेडियम की ओर उतरते ही दोनों ओर बने भवनों में रहने वाले अब देहात के वोटर हैं। बाढ़ इनके लिए सबसे बड़ी समस्या है। दीन दयाल नगर, आशियाना कालोनी के तमाम लोग इसी कारण पलायन कर जाते हैं।

साईं मंदिर रोड पर रहने वाले नीरज धवन चाहते हैं बाढ़ के डर को दूर करने वाला प्रतिनिधि ही चुनाव जीते। इलाके को देहात में शामिल होने के बाद चुनावी समीकरण गड्डमड्ड हो गए हैं। हाथी वाला मंदिर के पास खड़े तीन युवक कहने लगे कि हम सोच नहीं पा रहे किसे वोट दें। काशीपुर तिराहा होकर हम जैतपुर पहुंचे। यहां रमजान कहने लगते हैं कि सड़क की हालत देख लीजिए। बिजली मिलती नहीं। ठाकुरद्वारा की ओर बढ़ते ही ढेला नदी के आसपास वाले गांवों में रहने वाले कहते हैं एक अदद पुल की दरकार बरसों से है। भोजपुर पीपलसाने में पानी घुस जाता है। शीशा वाली फैक्ट्रियों का प्रदूषण यहां की प्रमुख समस्या है।

दोपहर 1.30 बजे ठाकुरद्वारा
देहात की सीमा से ठाकुरद्वारा इलाके में प्रवेश करते ही ऊबड़खाबड़ सड़क से सामना हुआ। इस इलाके में 1991 से सर्वेश सिंह विधायक रहे। बसपा की लहर में 2007 का चुनाव विजय यादव जीते। समस्याएं अभी कम नहीं हुईं। मुख्य मार्ग से तो जहांगीर पुर से नवादा के लिए जाने वाला मार्ग ज्यादा खूबसूरत लगता है। बुनकरों की कारीगरी मशहूर है। राशिद अली बताते हैं कि वोट के लिए हमेशा हम लोग इस्तेमाल हुए हैं। किसी ने सुध नहीं ली।

4.30 बजे, कांठ चौराहा
हरिद्वार मार्ग पर बसे कांठ इलाके की राजनीति किसानों व जाति के फैक्टर पर टिकी है। इस बार ठाकुरद्वारा का कुछ इलाका इसमें काटकर मिलाया गया है। यहां कांग्रेस-रालोद दोनों दलों के प्रत्याशी मैदान में हैं। सपा-कांग्रेस से दो सगे भाइयों की जंग भी किसी से छिपी नहीं है। सियासत में सब कुछ जायज कहने वाले लोगों के बीच समस्याएं किनारे हैं। गन्ना किसानों का गढ़ बनी कांठ की धरती सपा को छोड़ कर तकरीबन हर प्रमुख दल जीत का स्वाद चख चुका है। यहां पार्टी से ज्यादा जाति और वर्ग की राजनीति हावी है। अशरफ और चौधरी विनय कहते हैं कि जो हमारी बात कहे उसी को वोट देवे हैं। किसान को गन्ना की पर्चियां नहीं मिलतीं।

शाम 6.30 बजे कुंदरकी
काशीपुर तिराहे से तकरीबन सात किमी दूर सकटू नगला गांव में शाम को चौपाल में चुनावी चर्चा जोरों पर है। इसी गांव के प्रत्याशी कांग्रेस से मैदान में हैं। यह गांव पहली बार कुंदरकी सीट में जुड़ा है। यहां तकरीबन चालीस गांवों में बाढ़ का कहर रहता है। पिछली बार बसपा के विजयी प्रत्याशी हाजी अकबर मंत्री भी बने लेकिन कुंदरकी के नकटपुरी गांव के मजरे में ग्यारह बरसों से बिजली के खंभे ही खड़े हैं। धीमरी व लखनपुर के बीच तार काट लिए गए हैं। राजू बताते हैं कि हम हर बार वादों का शिकार हुए हैं। जो भी जीता इस गांव पर ध्यान नहीं दिया। इस बार पूर्व मंत्री मैदान में नहीं हैं।

रात 8 बजे: बिलारी
परिसीमन में यह नई सीट बनी है। इस तहसील के गांवों के बुनकरों की बुनी टोपियां अजमेर शरीफ से लेकर देवा शरीफ तक जाती हैं। बिजली संकट ने कारोबार को तोड़ दिया है। सहसपुर के बुनकर ताज मोहम्मद कहते हैं, कोई कद्र नहीं हमारे हुनर की। ताज की तरह इरफान अतहर और रईसुद्दीन जैसे युवा भी खत्म होते रोजगार, बिजली संकट से परेशान हैं लेकिन सबमें मतदान के लिए उत्साह है। इरफान कहता है कि वोट लेने वाले दोबारा नहीं लौटते। अब जांच-परख कर ही नेता चुनेंगे। बिलारी बस स्टेशन पर एक नौजवान फलों का ठेला लगाए खड़ा है। नाम बता है अशरत उर्फ सूखा। इसी इलाके की अरिल नदी की तरह इसकी जिंदगी में भी सूखा है। अशरत कहता है, वोट लेने तो बहुत नेता आते हैं, मुसीबत में फंसो तो कोई ना दीखे।

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