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पुराने वादों पर नई जमीन की तलाश

चक्रव्यूह का सातवां द्वार हमेशा से ही अभेद्य माना जाता है। यूपी के चुनावी चक्रव्यूह में रुहेलखंड ही सातवां और अंतिम द्वार है। सभी पार्टी के महारथियों ने इस आखिरी द्वार को तोड़कर विजय हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। यहां त्रिकोणीय से लेकर बहुकोणीय मुकाबले तक देखने को मिल रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा दिलचस्प है वोटरों की अदा। परिसीमन ने कई सीटें बदल दी हैं लेकिन वादे वही पुराने हैं। जहां तक मुद्दों की बात है तो बिजली-सड़क जैसे शाश्वत मुद्दों के साथ मनरेगा-एनएचआरएम जैसे राष्ट्रीय मुद्दे भी फिजा में तैरते नजर आ रहे हैं।

बरेली: सुबह 10.00 बजे

प्रमुख मुद्दों की चर्चा कहां
बिहारीपुर में डॉ. केके शर्मा पेशे से शिक्षक पवन को दवा लिखते-लिखते भी चुनाव की चर्चा करना नहीं भूलते। डॉ. शर्मा पूछते हैं, लोग किस मुद्दे पर वोट करेंगे। उत्तर, जिन मुद्दों की बात होनी चाहिए वो हैं ही कहां डांक्टर साब। एक मुद्दा कभी अलग रूहेलखंड राज्य का भी था। क्या आपको कोई भी पार्टी इस बात की चर्चा करती दिख रही है। बंद पड़ी रबड़ फैक्ट्री और पराग के बारे में भी कहीं कुछ सुनने को नहीं मिल रहा। एनएचआरएम तो राष्ट्रीय घोटाला मिशन बनकर रह गया। मनरेगा से रोजगार तो आया मगर उसमें भी फर्जीवड़ा के किस्से सुनने को मिलते रहे।

बरेली: दोपहर 12.00 बजे
गायब हुआ अन्ना फैक्टर

फ़कत चार-छह महीने पहले की ही बात है जब लगता था कि अन्ना फैक्टर विधानसभा चुनावों में मतदाताओं को बड़े स्तर पर प्रभावित करेगा। मामला एकदम उलट है। आप किसी से भी बात करिए वह अन्ना का नाम अब उत्साह से नहीं लेता। खुद अन्ना आंदोलन से जुड़े रहे बैंक कर्मी संजीव मेहरोत्र कहते हैं, कहने में अच्छा नहीं लगता मगर टीम अन्ना को जो जनसमर्थन मिला, उसे संभालने में हम नाकाम रहे। पीयूसीएल के अध्यक्ष यशपाल सिंह भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। बोले, यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे आप किसी मैच में शुरुआती बढ़त के बाद उसे गवां देते हैं।

अंगूरी: दोपहर 1 बजे
जाति-धर्म को प्रणाम

रामगंगा से लगे अंगूरी के सोम प्रकाश मनरेगा पर कांग्रेस से खुश तो दिखते हैं मगर वोट करने के नाम पर उन्हें अपनी जाति की याद आती है। कहते हैं, आज की तारीख में हर कोई अपनी जाति-धर्म पर ही जा रहा तो हम क्यों पीछे रहे। सोम प्रकाश जैसी साफगोई नंद किशोर, लल्ला बाबू और दिनेश कुमार में दिखाई तो नहीं देती मगर उनकी बातों से साफ था कि वोट अपनी जाति या उसे लाभ पहुंचाने वाले पर ही पड़ेगा। कारण, उनकी जाति वाला इस बार कहीं और से किस्मत आजमा रहा है। कनमन में चाट का ठेला लगाने वाला श्री पाल भी सब भूल अपनी बिरादरी का ही साथ देने की बात कहता है।

फरीदपुर: दोपहर 2.30 बजे
बाढ़ बहा सकती अरमानों पर पानी
बात अगर मुद्दों की ही हो तो बाढ़ को नजर-अंदाज नहीं किया जा सकता। कम से कम मीरगंज, फरीदपुर और कैंट विधानसभा में तो इसकी चर्चा होती दिख ही जाती है। फरीदपुर में एक आप्टिकल शॉप पर अपना चश्मा बनवाने आए हरप्रसाद गंगवार को ही सुन लीजिए। कहते हैं, बाढ़ ने गांव में जो तांडव मचाया उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। एक बार भी कोई झांकने नहीं आया। गुलाबनगर के योगराज और हरिद्वारी का दुख भी कुछ ऐसा ही था। मीरगंज विधानसभा के रामअवतार और जगत सिंह भी बाढ़ पीढ़ितों में शामिल हैं।

नवाबगंज: शाम 4 बजे
विकास की बातें सिर्फ मंच पर

नवाबगंज में एक चुनावी जनसभा से लौटते संजीव और हसनैन से मुलाकात हुई। बड़े नेता की सभा में खूब बड़े-बड़े वादे सुनकर लौटे थे दोनों। क्या पूरे होंगे यह वादे? जवाब संजीव ने दिया, वादे पूरे करने के लिए कहां किए जाते। ऐसी ही बात बहेड़ी विधानसभा में राष्ट्रीय स्तर के नेता की सभा में प्रवेश गुप्ता ने भी कही। बोले, हम सब बस चुनावी उत्सव का मजा लेने आते हैं। यह बात अब किसी से छुपी नहीं कि वादे क्यों किए जाते हैं।

भोजीपुरा: शाम 5 बजे
सड़क और बिजली पर ज्यादा नाराजगी

भोजीपुरा विधानसभा का प्रमुख कस्बा है धौंरा। व्यापारी मनोज गुप्ता और इरशाद में बातचीत जारी है। चर्चा में नैनीताल रोड से धौंरा तक की छह किमी की टूटी सड़क। लौट कर नई विधानसभा का चुनाव आ गया मगर इस टूटी सड़क के दिन नहीं बहुरे। निवर्तमान विधायक के प्रति गुस्सा दोनों ही युवाओं में साफ दिख रहा था। कभी चावल मिलों के लिए मशहूर इस कस्बे में बिजली कटौती ने धंधा चौपट ही कर डाला। नवाबगंज के सेंथल और मीरगंज में भी कहानी ऐसी ही है। सेंथल के काजिम कहते हैं, बिजली को लेकर न जाने कितनी बार हम लोग सड़क पर आए मगर स्थिति में कोई फर्क नहीं आया।

बरेली: रात 8.00 बजे
क्या आरक्षण है हर मर्ज की दवा
अल्पसंख्यक आरक्षण की बात कई मंचों से सुनाई देती है। जबकि जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां करती है। जैसे मांझा का काम करने वाले जोगी नवादा के शहजाद कहते हैं, समझ में नहीं आता कि आरक्षण से क्या होगा। जब काम ही नहीं होगा तो आरक्षण का क्या फायदा। हमें तो दलालों से मुक्ति चाहिए। बाकरगंज का सलमान भी आरक्षण के बजाए चाइनीज माङो से पीछा छुड़ाना चाहता है। कहता है, आरक्षण का लाभ तो तभी है जब बच्चे पढ़-लिख पाएं।

खास मुद्दे जो कहीं नहीं उठे
शहर में जाम की समस्या
औद्योगिक क्षेत्रों का विकास
महिलाओं की सुरक्षा
बिजली कटौती
जजर्र संपर्क सड़कें
कस्बों में मिनी स्टेडियम
किसानों को सस्ती दरों पर कर्ज
बालिकाओं के लिए कालेज
बाढ़ से बचाव
कस्बों में रोडवेज बस स्टैंड

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