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कोर्ट के फैसले के बाद शिक्षा पर छिड़ी बहस

निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों को मुफ्त उपलब्ध कराने के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद इस मुद्दे पर एक बहस शुरू हो गई है। सवाल ये हैं कि क्या यह शिक्षा में क्रांति की शुरुआत है, या निजी संस्थानों की स्वायत्तता पर कोई खतरा है और मध्य वर्ग पर वित्तीय बोझ?

न्यायालय के फैसले में निजी विद्यालयों से कहा गया है कि उन्हें शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के आधार पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को 25 प्रतिशत सीटें मुहैया करानी होगी। आरटीई अधिनियम देश में स्कूल जाने वाले हर बच्चों को शिक्षा की गारंटी देता है।

बेशक निजी विद्यालय, न्यायालय के इस निर्णय से खुश नहीं है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि 12 अप्रैल का आदेश सबके लिए समान अवसर की दिशा में एक बड़ा कदम है। अब माता-पिता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यह लागू कैसे होगा और कई तो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इससे कक्षाओं और स्कूली बसों में सामाजिक विभाजन न पैदा हो जाए।

दिल्ली के टैगोर इंटरनेशनल स्कूल की प्राचार्य मधुलिका सिंह ने कहा, ‘वंचितों को शिक्षा देने में कोई गलत नहीं है, लेकिन ऐसे में सरकार को पूरे शिक्षण शुल्क का भार वहन करना चाहिए, अन्यथा हमारे ऊपर यह आर्थिक बोझा बन जाएगा।’

कोलकाता के कुछ स्कूलों का मानना है कि यह बेहतर होगा कि उन्हें सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों की सूची में शामिल न किया जाए और वे गरीब विद्यार्थियों को छूट देने के लिए सरकारी सहायता लिए बगैर ही अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाने के लिए तैयार हैं।

सोसायटी फॉर अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स के अध्यक्ष, दामोदर प्रसाद गोयल का कहना है कि यह आरक्षण से अधिक स्कूलों की स्वायत्तता के बारे में है। 0गोयल ने कहा, ‘हम आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विद्यार्थियों को प्रवेश देने में स्वायत्तता हमारा मौलिक अधिकार है। सरकार राष्ट्रीय स्तर पर 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित नहीं कर सकती।’

गोयल अभी इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि वे प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाड़िया और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ के आदेश की समीक्षा के लिए अपील करेंगे या नहीं, लेकिन फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिक स्कूल्स ने कहा है कि इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए एक बड़ी पीठ के समक्ष याचिका दायर की जाएगी। इस फेडरेशन से नई दिल्ली के लगभग 300 विद्यालय जुड़े हुए हैं।

फेडरेशन के आरपी मलिक ने कहा, ‘हम सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करेंगे, लेकिन हम पूर्ण पीठ से इस निर्णय की समीक्षा चाहते हैं।’ उधर शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह कुछ अच्छी बात हुई है।

आरटीई मंच के संयोजक अम्बरीश राय ने कहा, ‘यह हमारे देश के वंचित बच्चों के लिए एक बड़ी जीत है और इससे उनके शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित होगा। फैसले ने इस रुख को जायज साबित कर दिया है कि शिक्षा प्रत्येक बच्चे का एक बुनियादी संवैधानिक अधिकार है।’

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