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9 दिसंबर, 2019|2:48|IST

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सौरभ की नई उड़ान

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के छोटे से गांव बदसारी से निकल कर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया तक का सफर 25 वर्षीय सौरभ प्रताप सिंह ने विपरीत परिस्थितियों को मात देकर तय किया। कैट में 99.65 पर्सेन्टाइल हासिल कर भारतीय प्रबंधन संस्थान रांची (आईआईएमआर) में दाखिला पाना सौरभ के लिए एक सपने के सच होने जैसा था। कैसे किया उन्होंने यह सब, इस बारे में बता रही हैं संगीता चौधरी

आईआईएम रांची से फाइनेंस में अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले होनहार छात्र सौरभ प्रताप सिंह ने 83.4 फीसदी अंक लाकर गोल्ड मेडल हासिल किया। झारखंड के गवर्नर डॉ. सैयद अहमद के हाथों मेडल मिलने पर सौरभ भाव-विभोर हो उठे। 12वीं के बाद इंजीनियरिंग की तैयारी कर सौरभ आईआईटी जॉइन करना चाहते थे, लेकिन आर्थिक तंगी ने उनका साथ नहीं दिया। सौरभ का अगला लक्ष्य आईआईएम था। इसके लिए उन्होंने स्नातक से ही तैयारी करनी शुरू कर दी थी। यह उनकी मेहनत का ही नतीजा था कि कोचिंग के बिना अपने पहले प्रयास में ही वह कैट में 99.65 पर्सेटाइल लाने में कामयाब रहे। अब देश के प्रतिष्ठित रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में 11 लाख के सालाना पैकेज के  साथ ग्रेड बी अफसर के रूप में उनका चयन हुआ है।

आठ भाई-बहनों में सबसे छोटे सौरभ के पिता सिंचाई विभाग में कार्यरत थे। जब वह छठी कक्षा में थे, तभी पिता सेवानिवृत्त हो गए थे। सरकारी मकान से निकल कर वे छोटे से मकान में किराए पर रहने लगे। बड़ा परिवार होने के कारण पिता के लिए घर चलाना मुश्किल था। कठिन आर्थिक परिस्थतियों के बावजूद सौरभ ने हार नहीं मानी। नागा जी सरस्वती विद्या मंदिर से दसवीं में 86.6 फीसदी अंक के साथ राज्य में नौवां स्थान हासिल किया। बारहवीं की परीक्षा भी इसी स्कूल से 85.6 फीसदी अंकों के साथ पास की।

भाई ने दिया साथ
सौरभ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज के इकोनॉमिक्स ऑनर्स में दाखिला ले लिया, लेकिन आगे का रास्ता उतना आसान नहीं था। दिल्ली जैसे महंगे शहर में रह कर उच्च शिक्षा दिलाना पिता जगत नारायण सिंह के लिए काफी मुश्किल था। ऐसे में उनके बड़े भाई गौरव ने साथ दिया। एमबीए में चयनित होने के बावजूद गौरव ने अपनी पढ़ाई पूरी नहीं की और सौरभ के साथ दिल्ली आ गए और प्राइवेट कंपनी में नौकरी शुरू कर दी।

असफलता ने दिखाई सफलता की राह
कॉलेज के आसपास के इलाके में कमरा किराए पर लेकर पढ़ना सौरभ की जेब पर भारी पड़ रहा था, इसलिए दोनों दिल्ली की पालम कॉलोनी में एक छोटे से कमरे में रहने लगे। वहां से हर दिन कॉलेज आना सौरभ के लिए काफी मुश्किल था। उसका सीधा असर स्नातक के परिणाम पर पड़ा। नियमित क्लास अटेंड नहीं कर पाने के कारण सौरभ मात्र 52.4 फीसदी अंक हासिल कर पाए। वह समझ गए थे कि आईआईएम में अपनी सीट पक्की करने के लिए कैट (कॉमन एडमिशन टेस्ट) में 99+ पर्सेटाइल से ज्यादा स्कोर करना होगा। स्नातक की असफलता ने सौरभ को कैट के लिए जीतोड़ मेहनत करने के लिए प्रेरित किया।

कड़े मुकाबले में दी सबको मात
दो साल की पढ़ाई के बाद जब प्लेसमेंट की बारी आई तो सबसे पहले आरबीआई ने कॉलेज में दस्तक दी। अपनी बुद्धिमत्ता और विवेक से सौरभ ने चयनकर्ताओं का दिल जीत लिया। 25 छात्रों को पछाड़ते हुए सौरभ का जब चयन हुआ तो उन्हें ऐसा लग रहा था, मानो एक बड़ी जंग जीत ली हो। इस बारे में सौरभ बताते हैं कि उनकी कक्षा के ज्यादातर छात्रों ने आईआईटी और एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की थी। ऐसे में मुकाबला काफी चुनौतीपूर्ण था, लेकिन सौरभ का एक ही लक्ष्य था अपने पिता और भाई गौरव के सपनों को साकार करना।

शिक्षकों को भी किया हैरान
सौरभ की प्रतिभा के कायल न सिर्फ उनके सहपाठी हैं, बल्कि शिक्षक भी उनसे काफी प्रभावित हैं। 2011 में नेशनल कॉफ्रेंस में ‘प्रोबेबिलिटीज ऑफ इंडियन इकोनॉमिक्स’ पर पेपर प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने ‘बेस्ट पेपर अवॉर्ड’ पर कब्जा किया। इस पेपर में खास बात यह रही कि सौरभ ने इसमें अपने ही शिक्षकों और सहपाठियों के प्रस्तुत किए पेपर को मात दी थी। इसी साल ‘प्रिडिक्टिव पावर ऑफ यील्ड कर्व’ पर पेपर प्रस्तुत कर सबको हैरान कर दिया।

गरीब छात्रों के लिए ‘समर्पण’
सौरभ जब भी किसी ऐसे छात्र को देखते हैं, जिसमें पढ़ने की ललक तो है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण अपने सपनों को उड़ान नहीं दे पा रहा है तो उसमें उन्हें खुद का अक्स दिखाई देता है। ऐसे जरूरतमंद छात्रों के लिए उन्होंने आईआईएम रांची में ‘समर्पण’ नामक एक क्लब की स्थापना की। यह क्लब फंड इकट्ठा करके गरीब छात्रों की शिक्षा और विकास में सहयोग देता है।

फैक्ट फाइल
नाम: सौरभ प्रताप सिंह (25)
पिता: जगत नारायण सिंह
चयन: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में ग्रेड बी अफसर
प्रिय खेल: क्रिकेट
शौक: किताबें पढ़ना और कविता लिखना
लक्ष्य: अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी के साथ निभाना और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान देना

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