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स्त्री मुक्ति के लिए व्यवस्था का विरोध हो पुरुष का

स्त्री मुक्ति के लिए व्यवस्था का विरोध होना चाहिए पुरुषों का नहीं। नारी की उपेक्षा के लिए व्यवस्था जिम्मेदार है। गांधी मैदान में चल रहे राष्ट्रीय पुस्तक मेले में सोमवार को नेशनल बुक ट्रस्ट की ओर से समसामयिक कथासाहित्य में स्त्री विमर्श पर हुई परिचर्चा में युवा कथाकार गौरीनाथ ने ये विचार रखे। कथाकार डा. उषा किरण खां ने कहा कि आज के कथा साहित्य में स्त्रियां अपना भाग्य अपने हाथों से लिखने लगी हैं।हालांकि आज भी ग्रामीण क्षेत्रो में स्त्री हाशिए पर ही है। सुकांत सोम ने मैथिली कथा साहित्य में स्त्री विमर्श की चर्चा करते हुए कहा कि समसामयक घटनाओं को साहित्य में उतरने में थोड़ा समय लगता है। मैथिली में 1925 में नारी विमर्श की धमक सुनाई देती है। कथाकार शोमोएल अहमद की राय मं आज स्त्री आंदोलन की बात होनी चाहिए न कि स्त्री विमर्श की। नारी आंदोलन को रोकने के लिए ही स्त्री विमर्श की बात चलायी गयी है। पुरुष सत्ता ने हमेशा स्त्री को वस्तु के रूप में देखा है।पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. बलराम तिवारी ने कहा कि स्त्री विमर्श , स्त्री मुक्ति के लिए नैतिक आधार तैयार करेगा। सतीत्व, शूचिता आदि पितृसत्ता के मूल्य हैं। ये नारी के लिए बेड़ी का काम करते हैं। इनसे मुक्ति जरूरी है। कवि सुरेन्द्र स्निग्ध ने कहा कि स्त्री विमर्श नारीवादी आंदोलन नहीं है।स्त्री मुक्ति क लिए जरूरी है कि ब्राह्मणवाद से मुक्त हुआ जाए। मन्नू भंडारी का लेखन स्त्री विमर्श नहीं है। डा. राम वचन राय ने कहा कि स्त्री विमर्श ने समाज को जोड़ा भी है। डा. वीरेन्द्र नारायण यादव ने कहा कि स्त्री विमर्श ने जीर्ण-शीर्ण मूल्यों को ध्वंस कर नए मूल्यों का निर्माण किया है। कार्यक्रम का संचालन तस्नीम कौसर ने किया।

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