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पीलीभीत के बाद अब वाराणसी में भी होगी सेब की खेती

केंद्रीय मंत्री मेनका संजय गांधी के संसदीय क्षेत्र पीलीभीत के बाद नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव में भी सेब की खेती की जाएगी। इसके लिए अभी करीब एक महीने का समय लग जाएगा। इस बीच पूरनपुर के बाद अमरिया में भी किसानों को सेब की पौध दे दी गई है। जल्द ही इनका रोपण भी कर दिया जाएगा।

पूरनपुर में सेब की खेती करने की तैयारी की जा रही है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने मंगलवार को समरिया में दस पौधे खुद ही लगाए। इसके साथ ही यहां के 100 किसानों को इसकी पौध मुफ्त में दे दी गई है। इसके बाद अब अमरिया ब्लॉक में भी 10 किसानों को पौधे दिए गए हैं।

सेब की खेती का प्रशिक्षण देने गुजरात से यहां आए नव प्रवर्तन प्रतिष्ठान के वैज्ञानिक डा. जियाउल हक ने बताया कि अब तक देश में कर्नाटक, बैंगलुरु और राजस्थान में इसकी खेती शुरू करा दी गई है। उत्तर प्रदेश में पहली बार पीलीभीत को सेब की खेती के लिए चुना गया है। कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में भी पौध लगाई जाएगी। इसके लिए मोदी के गोद लिए गए गांव जयापुर का चुनाव किया गया है। उन्होंने बताया कि एक सेब कम से कम 200 ग्राम का होगा। यहां लगाई गई पौध में दो हिस्से हैं। ऊपर हिस्सा हिमाचल का है और जड़ कश्मीर की है। उन्होंने बताया कि हम हिमाचल प्रदेश का नाम सुनकर चौंक जाते हैं, लेकिन हिमाचल में बिलासपुर ऐसी जगह है, जहां का क्लाइमेट उत्तर प्रदेश जैसा ही होता है। वहां का तापमान में भी अक्सर 50 डिग्री तक पहुंच जाता है। ऐसे में इसकी आशंका बहुत कम ही है कि पीलीभीत में ये पौधे फल नहीं देंगे। उनका कहना है कि दो से ढाई साल बाद ये पौधे फल देने लगेंगे।

किसान हरमन ने बनाई यह प्रजाति
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में किसान हरमन ने साल 1999 में सेब की इस तरह की प्रजाति बनाई थी। यह उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। हरमन के अनुसार, इस प्रजाति की खेती के लिए विशिष्ट प्रक्रियाओं को अपनाया जाना आवश्यक है। पौध को लगाने के लिए समतल और पहाड़ी क्षेत्रों में चौकोर या आयाताकार प्रणाली ही अपनानी चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों की ढलान भूमि पर पौधरोपण के लिए कंटर विधि ही सर्वोत्तम है। गुणात्मक और मात्रात्मक सेब उत्पादन के लिए पौधों में उचित दूरी रखी जाए, ताकि शाखाएं आपस में न उलझें। साथ ही प्रकाश और हवा की उपलब्धता अति आवश्यक है।

ऐसे करनी होती है खेती
पौध रोपण से एक महीना पहले 90 वाई 90 सेंटीमीटर का गड्ढा तैयार करें। उसमें 10 से 20 किलो गली सड़ी गोबर की खाद को मिट्टी में अच्छी तरह मिला कर भरें। मिट्टी में 25 ग्राम नाइट्रोजन, 15 ग्राम सुपर फोस्फेट, 25 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश भी मिलाएं। दीमक से बचाव के लिए पांच लीटर पानी में 25 मिली लीटर क्लोरोपाइरीफोस या टाईसिल मिलाकर मिट्टी में ड्रेंच कर दें। पौध का प्रत्यारोपण दिसम्बर और फरवरी में किया जा सकता है। पौधे को गड्ढों के बीचोंबीच लगाएं। इसके बाद आसपास की मिट्टी को पैरों से दबाएं। ध्यान यह रखा जाए कि मिट्टी को उतना ही दबाएं जितना वो नर्सरी में दबा हुआ था। पौध इस तरह लगाएं कि कलमबंदी वाला भाग मिट्टी से छह से आठ इंच बाहर रहे।

ऐसे करें देखभाल
पहली सिंचाई प्रत्यारोपण के तत्काल बाद की जानी चाहिए। गर्मियों के मौसम में तीन से चार सिंचाई प्रतिमाह और सर्दी में दो सिंचाई प्रतिमाह की जानी चाहिए। बारिश में पानी गड्ढे के इर्दगिर्द जमा न हो जाए, इसलिए गड्ढे की मिट्टी को तिरछी सतह के साथ तैयार करें। गड्ढे के आसपास के क्षेत्र को खरपतवार से मुक्त रखें। गुड़ाई साल में कम से कम चार बार की जानी चाहिए। गड़ाई हल्की करें। सेब के पौधे की जड़ें सतह पर ज्यादा प्रसार करती हैं। इसे नुकसान न पहुंचे। प्रत्यारोपण के तुरंत बाद कुछ कुछ समय बाद कटाई छंटाई करना जरूरी है। पौध को 60 से 75 सेमी पर काटना चाहिए। पौध को अंगे्रजी के वी शेप में काटें, ताकि पौधे का आकार छतरीनुमा हो जाए।

मेनका ने तीन लोगों की कमेटी बनाई
केंद्रीय मंत्री इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर काफी गंभीर हैं। इसके लिए उन्होंने मोरमुकुट, बाबूराम पासवान, राजू आचार्य को जिम्मेदारी सौंपी है। वे समय समय पर इसकी जानकारी लेते रहेंगे। अगर कहीं कोई दिक्कत होगी तो सीधे वैज्ञानिकों से बात करेंगे और समाधान भी सुझाएंगे।

पूरनपुर के इन किसानों को मिली पौध
प्रगट सिंह, कमरवीर सिंह, अवतार सिंह, गुरुदयाल सिंह, हरदेव सिंह, गुरुमंगद सिंह, बलवीर सिंह, रंजीत सिंह, सुखदेव सिंह, रविंद्र सिंह, सुखविंद सिंह।

अमरिया के इन किसानों को मिली पौध
दिलबाग सिंह, सतनाम सिंह, संजय गुप्ता, अशोक भसीन, रविंदर सिंह, करनैल सिंह, डा. कुलदीप, मंजीत सिंह, कुलवीर सिंह, सर्वजीत सिंह, प्रमोद पटेल।

उत्तर प्रदेश में यह पहली बार है जब सेब की खेती की जाएगी। सर्वाइवल न होने की कोई संभावना नहीं है। बस देखना यह है कि इसका फल कितना बड़ा होता है। फिर भी उम्मीद है कि कम से 200 ग्राम का होना चाहिए। मैं समय समय पर आकर इसकी प्रगति लेता रहूंगा। अब जल्द ही बनारस के जयापुर गांव में पौध लगाई जाएगी।
डा. जियाउल हक, वैज्ञानिक, राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान, गुजरात

 

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