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सादगी का भव्य सौंदर्य

लेखक-विचारक अशोक सेकसरिया का निधन इस 29  नवंबर को हो गया। अशोक जी कोलकाता के एक समृद्ध परिवार में पैदा हुए थे। विख्यात समाजसेवी और शिक्षाकर्मी सीताराम सेकसरिया के पुत्र अशोक ने निहायत सादगी भरा और प्रचार से दूर जीवन जिया। वे निष्ठावान समाजवादी और मौलिक रचनाकर्मी थे। उन्होंने कई संस्थाओं और लोगों के जीवन को समृद्ध बनाया। इस अद्वितीय व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत है उनकी कहानी ‘विकल्प’



वह आज भी हेस्टिंग्स की ओर चला आया। हुगली के किनारे बैठ कर नावों को देखना व उस पार के विज्ञापनों को पढ़ना उसका पुराना शौक था। आज का दिन रोज की ही तरह था,  पर उसके लिए नहीं था। ऑफिस में आज उसे नौकरी से नोटिस मिल गया था। अगले महीने से वह बेकार हो जाएगा। उसने सोचा- आज का दिन उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पर इस दिन की महत्ता की कोई अनुभूति उसे नहीं हुई। उसने सोचा था,  नौकरी छूट जाने पर (छूट गई) वह क्या करेगा?  कलकत्ते की सड़कों की धूल छानेगा - उसके दिमाग में कुछ भी नहीं आया। मन की सारी क्रियाएं कहीं जाकर सो गई थीं। उसे लगा उसके दिमाग को किसी ने एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगा दिया है और वह सुन्न हो गया है। वह मन ही मन बड़बड़ाया,  स्थिति के महत्व को समझने के लिए कुछ स्पष्ट करना आवश्यक है। उसने मन ही मन कहा- आज मेरी नौकरी छूट गई है,  एक महीने तक मैं नौकरी पर और बना रहूंगा,  फिर फर्म वाले मुझे दो महीने की तनख्वाह दे देंगे और मुझे कलकत्ते की सड़कों पर फेंक देंगे।

उसने इन वाक्यों को मन ही मन दुहराया और फिर पेन निकाल बड़े-बड़े अक्षरों में इन्हीं वाक्यों को लिखा,  किन्तु वह सुन्न ही रहा। कुछ ही अनुभूति - अपनी नौकरी छूटने का दुख या अपने भविष्य के प्रति भय - उसे नहीं हुई। बस वह चुपचाप घास पर लेटा रहा। बगल से मार्टिन वर्न की मालगाड़ी चली गई। सामने जल था,  जहाज थे,  छोटी-छोटी नावें थीं,  बीच में रेलवे लाइन थी और पार सड़क थी,  जिस पर मोटरें थीं। यातायात के सब साधन एक ही साथ थे। ऊपर आकाश की ओर उसने देखा,  कहीं कोई हवाई जहाज तो नहीं उड़ रहा है। आकाश एकदम स्वच्छ और नीला था। उसने सोचा- पहली दिसम्बर को वह बेकार हो जाएगा यानी क्रिसमस के समय वह बेकार होगा। उसे खुशी हुई कि वह दोपहर ही को न्यू मार्केट घूम सकेगा। रेस्तराओं के ‘मार्निग सेशन’  सुना करेगा। पर यह सब तो वह व्यर्थ ही सोच रहा था।

इसके सोचने की कोई तुक नहीं थी,  कोई तुक नहीं होती। वह प्राय: उन चीजों के बारे में सोचता है जिनका महत्व नहीं के बराबर होता है और जिनका उसके जीवन से कोई संबंध नहीं होता। नवम्बर की छोटी होती शामें कब रात हो जाती हैं, पता ही नहीं लगता। उसने नदी की ओर से जब सड़क की ओर देखा तो शाम चली गई थी और रात घिर आई थी। हल्की सर्दियों की रात थी,  उसने स्वेटर नहीं पहन रखा था। काली रात,  भयावनी रात,  उसने मन ही मन कहा और वह डरने का उपक्रम करने लगा। जहाजियों के लिए रेलवे लाइन के पास बने छोटे-से चायघर की बेंच पर जाकर वह बैठ गया और चाय पीने लगा। बूढ़े खलासी,  मांझी चाय पी रहे थे और नमकीन-बिस्कुट खा रहे थे। इनका जीवन समुद्र और नदी पर ही बीत जाता है। वह उन्हें बहुत भाग्यशाली मानता था।

उसे याद आया,  एक दिन उसने इला से यहां हुगली के किनारे कहा था- वह समुद्र में पलायन कर जाएगा,  समुद्र उसे बहुत प्यारा लगता है और उसने स्कूल में पढ़ी मेंसफील्ड की कण्ठस्थ कविता ‘सी फीवर’ उसे सुना दी थी। इला ने इस पर कहा था- यह सब बकवास रहने दो। किन्तु वह अपने उत्साह में बहता ही रहा- इला मैं,  एक दिन मैं अपने एक जहाजी मित्र के साथ जहाज देखने गया था,  उसकी केबिन के चारों ओर ‘पिनअप्स’ लगे थे। उसने गर्व से मुझे कहा था,  मैं यहां इतनी लड़कियों के साथ रहता हूं और ठठाकर हंस पड़ा था। इस पर इला ने कहा था वह कभी समुद्र में पलायन नहीं कर सकता,  वह कभी कुछ नहीं कर सकता। यहां बैठे अतलान्तिक और प्रशान्त महासागर की बातें कर सकता है। इन शब्दों का उच्चरण करने में ही उसे आनन्द आता है। वह अतलान्तिक बोलने में ही अतलान्तिक जाने का आनन्द अनुभव कर लेता है। फिर रुक कर इला ने कहा था,  यहां उसने जहाज देख लिए,  नदी देख ली,  भोंपू सुन लिया और कह दिया समुद्र में पलायन कर जाऊंगा। वह वेग में आ गई थी,  उसने कहा था- मैं भौंचक्का हूं,  तुम्हारी इस तरह की उड़ती-उड़ती बातों पर।

कुछ कहना,  यदि वह अच्छा लगता है,  चाहे वह एकदम बेकार और निर्थक क्यों न हो,  तुम जरूर कहोगे। उड़ती-उड़ती बातें करना तुम्हें अच्छा लगता है। वह एकदम सकते में आ गया था। अक्सर इला इसी तरह उसे कहा करती थी, उसके आवेग को,  उत्साह को शिथिल कर देती थी। वह प्राय: निर्थक बातें ही सोचता और भावावेग में बहता रहता। कभी-कभी उसे लगता कि उसके पास सिर्फ एक उड़ता-उड़ता सा भावावेग है और कुछ नहीं। उसने जोर देते हुए कहा था- इला, तुम मुझे हरदम उड़ा देती हो। क्या मैं समुद्र में पलायन नहीं कर सकता!  आओ शर्त बदो,  पर एक मेरी भी शर्त है। क्या?  इला ने पूछा था। उसने कहा, मेरे जन्मदिन वाले ‘स्टेट्समैन’ में ‘रिमेम्ब्रेंस’ की दो पंक्तियां छपवा देना।

इला ने इस पर बिगड़ते हुए कहा था,  बेकार की बात मत करो। इन शहीदाना, बेकार, फिजूल की बातों से तुम मुझे बिल्कुल प्रभावित नहीं कर सकते। उसका उत्साह एकदम ठंडा पड़ गया था। पर आज उसने मन ही मन सोचा,  वह सचमुच ही समुद्र में पलायन कर सकता है। उसकी नौकरी छूट गई है। वह सब कुछ कर सकता है। पलायन कर सकता है और इलाका कहीं दूर बन्दरगाह से पत्र डाल सकता है- इला तुम गलत थीं। उसे एकाएक लगा कि विचार से उसके सामने का सारा धुंधलका हट गया है,  उसका भविष्य एकदम साफ है। वह पलायन कर जाएगा,  इला जान सकेगी कि वह केवल भावुक,  हवा में बातें करने वाला ही व्यक्ति न था। जीवन खुल गया है,  उसने सोचा। विगत और भविष्य के बीच इला थी। वह कभी उसके संसार से कटकर ‘डायमंड हार्बर’  रोड के एक मकान में जा बसी है।

वह ट्राम से अक्सर डायमंड हार्बर रोड होकर गुजरा है। इला का मकान भी वह जानता है। मकान आने से ही वह ट्राम की खिड़की से बाहर मुंह कर लेता है और देखता है। इला बरामदे में है या नहीं?  आज यहीं से बस लेकर वह इलाके पार जा सकता है,  कह सकता है,  इला मैं सभी बातें बेकार नहीं कहा करता था। पर वह क्यों जाए?  जाने पर इला हंसेगी ही। उसे याद आया कॉलेज में किस सरलता से इला ने एक दिन कहा था कि उसका आशीर्वाद (सगाई)  हो गया है। उसने पूछा था कि पहले उसने कभी नहीं बताया?  क्या बताती?  जब हो गया,  तब बता दिया। वह सोचता है आशीर्वाद की बात क्या इतनी सरल थी?  पर इस बारे में वह कभी कुछ साफ नहीं सोच पाता था। कुछ भी याद नहीं आता था सिर्फ एक बार क्लास खत्म होने के बाद वह इला को बस स्टाप पर छोड़ने नहीं गया था।

घर आते-जाते उसने सोचा कि अपनी अगले महीनों की तनख्वाह से वह रूथ को उसके विवाद के अवसर पर एक अच्छा-खासा उपहार देगा। रूथ अच्छी लड़की है। जब वह ऑफिस में उसे कहता है रूथ,  सच बात तो यह है कि रौनी तुम्हें प्रेम नहीं करता,  तब वह खुश होती है,  मानो उसने कहा हो  ‘रॉनी प्रेम करता है।’  वह हंसता है और जानबूझ कर सोचता है,  उसके वाक्यों के अर्थ हरदम उलटे होते हैं। हेस्टिंग्स से वह मैदान होता हुआ ट्राम टर्मिनल पर आया। थकावट के कारण घर पहुंचते ही उसे नींद आ गई।

सवेरे जब उठा तो उसने देखा,  वह जूते पहने ही सो गया था। कल की सारी घटना याद हो आई। न जाने उसे क्यों यह याद नहीं आया कि वह कल नदी किनारे गया था,  बल्कि उसे सबसे अधिक यही याद आया कि उसकी नौकरी छूट गई है। अखबारवाला अखबार दे गया था। उसने अखबार के शीर्षकों पर भी नजर नहीं दौड़ाई। ‘वान्टेड कालम’  देखने लगा। फिर पेन से वह कागज पर कुछ नोट करने लगा। एक मर्चेन्ट नेवी कम्पनी को क्लर्को की आवश्यकता थी। उसने सोचा, वह इसी कम्पनी में अर्जी देगा। समुद्र में पलायन करने की बात उसे याद आई। वह अपने ही में ठठाकर हंस पड़ा। कदाचित, इला ने गलत नहीं कहा था।

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