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एक विलक्षण कथाकार, समाजसेवी व मित्र

अशोक सेकसरिया लेखकों के आत्मीय मित्र थे,  खुद अनोखे कथाकार होते हुए वे ख्याति से दूर रहना चाहते थे। उनके कुछ मित्रों ने बिना उन्हें बताए उनका एकमात्र कहानी संग्रह ‘लेखकी’ प्रकाशित करवाया। उनके आत्मीय प्रयाग शुक्ल उनकी यादों को साझा कर रहे हैं।


अशोक सेकसरिया उन व्यक्तियों में से थे,  जिन्होंने हमेशा अपने को पीछे रखकर दूसरों को आगे बढ़ाया। युवा लोगों को विशेष रूप से लिखने-पढ़ने,  कुछ रचने के लिए प्रेरित किया। 29 नवंबर 2014  को कोलकाता में जब दो हृदय-आघातों के बाद उनका देहांत हुआ तब वह 80 वर्षों से अधिक के थे। लिखना उन्होंने 20 वर्ष की आयु में शुरू किया था,  पर आरंभ में जो कहानियां छपने को भेजीं,  वे गुणेंद्र सिंह कंपनी के नाम से थीं। ‘कृति’  पत्रिका में प्रकाशित होते ही इन कहानियों ने साहित्य-जगत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। बाद में ‘कल्पना’,  ‘कहानी’, ‘सारिका’  आदि पत्रिकाओं में उनकी कहानियां उनके वास्तविक नाम से ही प्रकाशित हुईं,  पर ‘लेखकी’ के नाम से उनका कथा-संग्रह आज से कोई चौदह वर्ष पहले 2000 में ही आ सका। कारण यही था कि वे कहानियां लिखना-छापना बंद कर चुके थे, और चाहते नहीं थे कि वे संकलित हों।

यह संग्रह उन्हें बिना बताए,  वाग्देवी प्रकाशन,  बीकानेर से प्रकाशित और सन 2000 के पुस्तक मेले  (प्रगति मैदान, दिल्ली)  में प्रभाष जोशी और कुंवर नारायण के हाथों लोकार्पित हुआ। कहानियां संकलित करने की पहल पत्रकार अरविंद मोहन की ओर से हुई,  भूमिका मैंने लिखी। अशोक जी से मैं चौदह-पंद्रह वर्ष की आयु में ही मिला था। हमारी दोस्ती को अब साठ वर्ष हुए। इसी मैत्री का वास्ता था कि संग्रह को अंतत: उन्होंने स्वीकार कर लिया,  पर इसकी रॉयल्टी कभी स्वीकार नहीं की। हिन्दी गद्य उनकी कहानियों के साथ ही जन दिनमान,  चौरंगी वार्ता, सामयिक वार्ता, रविवार आदि में प्रकाशित उनके लेखों/टिप्पणियों से भी बेहद समृद्ध हुआ है। उन्होंने बाकायदा पत्रकारिता भी की। वे दिल्ली में ‘हिन्दुस्तान’ में भी रहे। वे समाजवादी आंदोलन से जुड़े और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक वृहद मंडली के भी प्रिय बने।

चित्रकारों,  लेखकों,  कवियों और विभिन्न कलाओं के कलाकारों के साथ तो उनके रिश्ते बहुत सघन और आत्मीय थे ही। वे गांधी युग के एक प्रमुख समाजसेवी और शिक्षा अभियानी पद्मविभूषण सीताराम सेकसरिया के ज्येष्ठ पुत्र थे। पिता की डायरियों का उन्होंने ‘एक कार्यकर्ता की डायरी’  (ज्ञानपीठ से प्रकाशित)  का दो खंडों में संपादन किया है। यह ग्रंथ ऐसा है कि इससे संपादन कला के बारे में भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। ज्ञान-विज्ञान की तमाम शाखाओं में उनकी रुचि थी। क्रिकेट समेत अन्य खेलों की जानकारी और ज्ञान में विशेष रूप से। संपन्न घर में जन्मे और
समृद्धि के नए सोपान चढ़ने वाले परिवार के बीच उन्होंने अत्यंत सादा जीवन जिया।

16 लॉर्ड सिन्हा रोड,  कोलकाता ही उनका ठिकाना रहा पिछले पचास वर्षों से। विवाह उन्होंने किया नहीं। लिखना-पढ़ना-पत्रकारिता ही उनका जीवन रहा। न जाने कितने मित्रों-परिचितों और अपरिचितों के जीवन को भी उन्होंने अपने आत्मीय स्पर्श और उत्सर्ग से सींचा है। जैसे एक किसान अच्छी फसल के लिए प्रयत्नशील होता है,  वैसे ही आजीवन ‘अच्छाई’  की फसल के लिए वे बेचैन रहे। वे ‘कलिकथा: वाया बाईपास’  (अलका सरावगी)  और  ‘आलो आंधारि’  (बेबी हाल्दार)  जैसी कृतियों के प्रथम प्रोत्साहक-संरक्षक थे। रायकृष्ण दास,  निर्मल वर्मा,  बालकृष्ण गुप्त  (जो लोहिया के सहयोगी थे)  आदि पर लिखे हुए उनके संस्मरण भी अपूर्व हैं। उनकी कहानियां तो उनकी विलक्षण रचनाशीलता का प्रमाण हैं ही। उनमें एक ‘गांधी तत्व’ था और ऐसी सादगी, जो ‘उन्नत’ माथे वाली थी।

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