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दर्द का तर्जुमा आवाज में

संग्रह की कविताएं इस मायने में अलग हैं कि इनमें सामाजिक विद्रूपताओं का केवल उद्घाटन भर नहीं किया गया है, बल्कि उनके खिलाफ संघर्ष का आह्वान भी किया गया है। आजाद एक सक्रिय सामाजिक कार्यकता भी हैं और उनकी कविता पर इसका स्पष्ट असर भी दिखता है। जाहिर है कविता लिखना उनके लिए दलित-वंचित जमात के अधिकारों की लड़ाई का जरिया है। यही वजह है कि इस संग्रह की ज्यादातर कविताएं यथार्थ अनुभवों की ठोस जमीन पर खड़ी हैं। इनमें बाबा अंबेडकर,  महात्मा फुले,  बिरसा मुंडा आदि नायकों को श्रद्धापूर्वक याद किया गया है,  जिन्होंने आजाद के शब्दों में,  ‘एक सिफर में घूमती बेवजह सी जिंदगी में मुकम्मल आजादी के रंग घोले हैं।’  यहां जहां संघर्ष की ताप है, वहीं एक दलित युवा के स्वप्नों की अभिव्यक्ति भी है।
कंडीशंस अप्लाई,  गुरिंदर आजाद,  साहित्य संवाद,  दिल्ली-88,  मू. 60 रु.

राष्ट्रीयता की अवधारणा

यह पुस्तक उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिंदी भाषाभाषी प्रदेश में रचे गए साहित्य के विश्लेषण के माध्यम से देश में राष्ट्रीयता की चेतना के विकास की पड़ताल करती है। राष्ट्र, राज्य और राष्ट्रीयता की प्रचलित धारणा का मूल यूरोप के राजनीतिक इतिहास में है,  जो अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के साथ भारत आया,  लेकिन इससे काफी पहले से भारत के पास एक अपना राष्ट्र-बोध मौजूद था,  जिसका आधार कोई अविच्छिन्न राजनैतिक सत्ता की बजाय सांस्कृतिक-भौगोलिक एकता थी। औपनिवेशिक शासन के स्थापित होने के बाद इन दोनों धारणाओं में जबरदस्त मगर दिलचस्प टक्कर हुई। भारतेंदु युग के साहित्य की चेतना इस द्वंद्व के बीच ही निर्मित हुई। राष्ट्रीयता की हमारी वर्तमान अवधारणा भी इस द्वंद्व से मुक्त नहीं है।
राष्ट्रीयता की अवधारणा और भारतेन्दुयुगीन साहित्य,  प्रमोद कुमार,  अनुज्ञा प्रकाशन,  नई दिल्ली-32,  मू. 499 रु.


जिंदा है यकीन

‘थैंक्यू मरजीना’ वरिष्ठ कवि रतीनाथ योगेश्वर का पहला कविता संग्रह है। इन कविताओं में शिल्प के स्तर पर सहजता है जबकि कथ्य गहरी संवेदना से आपूरित। इनके विषय के चुनाव में भी खासी विविधता है। योगेश्वर ने अधकपारी से लेकर सांप के अंडे तक को अपनी कविता का विषय बनाया है,  लेकिन इनका मूल स्वर मानवीय जीवन का जयगान है। ये कविताएं तमाम प्रतिकूलताओं के बीच जीवन मूल्यों के पक्ष में आवाज उठाती हैं। इनका एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि ये सही-गलत में फर्क करने को लेकर स्पष्ट बौद्धिक दृष्टि प्रस्तुत करती हैं। वस्तुत: इन कविताओं में योगेश्वर ने आम-फहम चीजों के जरिए जीवन की अर्थवत्ता ढ़ूंढ़ने की सार्थक कोशिश की है।
थैंक्यू मरजीना,  रतीनाथ योगेश्वर,  साहित्य भंडार,  इलाहाबाद,  मू.: 50 रु.

जीने के गुर

वर्तमान पूंजी केंद्रित समय में सफलता चरम सामाजिक मूल्य मानी जाती है। ऐसे में बेहिसाब प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। स्वाभाविक सुख-शांति दूर चली गई है। इस बीच ऐसे पढ़े-लिखे लोगों की एक जमात भी सामने आ चुकी है,  जो लोगों को मानसिक-आध्यात्मिक उपायों से तमाम भौतिक दबावों के बीच बेहतर जीवन जीने की राह दिखलाती है। प्रस्तुत पुस्तक इसी सिलसिले की एक कड़ी है,  जिसमें जीवनशैली को सुधारने, अपनी सीमाओं को पहचानकर मानसिकता बदलने के गुर बताए गए हैं।
लाइफ्स वेकअप कॉल,  ममता भार्गव,  कॉर्पोरेट लॉ एडवाइजर, नई दिल्ली,  मू. 225 रु.

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  • Web Title:दर्द का तर्जुमा आवाज में