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इकबाल की विरासत

कवि-चिंतक अल्लामा इकबाल आधुनिक काल में शायद सबसे ज्यादा गलतफहमियों के शिकार लोगों में से भी हैं। भारत में उन्हें पाकिस्तान की अवधारणा को सबसे पहले पेश करने वाली ऐसी शख्सियत के रूप में जाना जाता है, जो कभी भारतीयता के समर्थक थे और बाद में सांप्रदायिकता के पक्ष में चले गए। पाकिस्तान में इसी बात के लिए उन्हें पूजा जाता है। वे मूलत: शायर थे, लेकिन भारत में दो-चार रचनाओं के अलावा शायद ही उनके काव्य की चर्चा होती है। इन गलतफहमियों की वजह काफी हद तक खुद इकबाल का व्यक्तित्व और कृतित्व है। इकबाल बड़े विद्वान और चिंतक थे, लेकिन उनके विचार किसी खांचे में नहीं अंटते। इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि इकबाल उस पाकिस्तान के समर्थक थे, जो मुस्लिम लीग ने बनाया। सन 1934 में ईजे थॉमसन को लिखी चिट्ठी में इकबाल कहते हैं- ‘आप मुझे पाकिस्तान की योजना के उद्घोषक कहते हैं। पाकिस्तान मेरी योजना नहीं है। मैंने अपने भाषण में जो सुझाव दिया था वह भारत के उत्तर -पूर्व में एक मुस्लिम प्रांत का था। मेरी योजना के मुताबिक यह प्रांत प्रस्तावित भारतीय संघ का हिस्सा होगा।’ इकबाल के विचार इस मुस्लिम प्रांत के बारे में बदलते रहे, लेकिन भारत विभाजन की कल्पना उनके यहां कहीं नहीं है। बंगाल में तो वे मुस्लिम बहुमत वाला प्रांत भी नहीं चाहते थे।

इकबाल के विरोधाभास उनमें जर्मनी की यात्रा के बाद पैदा हुए। इससे पश्चिमी सभ्यता के खिलाफ उनमें विद्रोह जागा। लेकिन उन्हें यह लगता था कि पश्चिम का व्यक्ति की महत्ता का विचार महत्वपूर्ण है। उसी तरह वे लोकतंत्र के घोर खिलाफ थे, लेकिन व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता और बराबरी के सख्त हिमायती थे। उन्होंने इस्लामी संस्कृति में इन मूल्यों का आधार खोजा। इस मायने में वे गांधी के बहुत करीब दिखते हैं। उन्होंने कहा कि हम पश्चिम से लड़ने की बात करते हैं, लेकिन हम सारी पश्चिमी संस्थाओं को स्वीकार करना चाहते हैं, इसलिए यह पश्चिम के खिलाफ विद्रोह नहीं है। विचित्र बात यह है कि उनका हिंदू नेताओं से विरोध इस बात को लेकर था कि वे पश्चिमी किस्म का लोकतंत्र चाहते हैं और इस तरह अपने धर्म और संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। वे मुसलमानों को इससे बचाना चाहते थे। वे इस्लामी परंपरा पर आधारित ऐसी व्यवस्था चाहते थे, जिसका आधार सत्ता और ताकत नहीं, बल्कि व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता हो, लेकिन गांधी के बरक्स वे जनांदोलनों के पक्ष में नहीं रहे।

उन्होंने खिलाफत को बचाने की कोशिशों की आलोचना की और वे मुस्तफा कमाल पाशा के समर्थक थे। उनमें प्रगतिशीलता और परंपरावाद का अजीब घालमेल है। जो भी हो, वे सांप्रदायिक नहीं थे। इकबाल के विरोधाभास एक बड़े चिंतक और कवि के विरोधाभास हैं। वे भी कहते हैं कि वे राजनेता नहीं हैं, उनके विचारों को एक कवि के उद्गारों की तरह ही देखा जाना चाहिए और बेशक वह हमारे सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवियों में से हैं।

अल्लामा इकबाल की कुछ रचनाएं


तेरी महफिल भी गई, चाहने वाले भी गए
शब की आहें भी गई, सुब्ह के नाले भी गए!

दिल तुझे दे भी गए, अपना सिला ले भी गए
आके बैठे भी न थे और निकाले भी गए

आए अश्शाक, गए वादए फर्दा लेकर
अब उन्हें ढूंढ चरागे रूखे जेबा लेकर!

विर्दे लैला भी वही, कैस का पहलू भी वही
नजद के दश्तो जहल में रमे आहू भी वही

इश्क का दिल भी वही, हुस्न का जादू भी वही
उम्मते अहमदे मुरसल भी वही, तू भी वही

फिर ये आजरुदगीए गैर सबब क्या मानी?
अपने शैदाओं पे ये चश्मे गजब क्या मानी?

तुझ को छोड़ा कि रसूले अरबी को छोड़ा?
बुत गरी पेशा क्या? बुतशिकनी को छोड़ा?

इश्क को, इश्क की आशुफ्ता सरी को छोड़ा?
रस्मे सलमान व उवैस करनी को छोड़ा?

अनोखी वजह है सारे जमाने से निराले हैं
ये आशिक कौन सी बस्ती के यारब रहने वाले हैं

इलाजे दर्द में भी दर्द की लज्जत पे मरता हूं
जो थे छालों में कांटे नोक सोजन से निकाले हैं

फला फूला रहे यारब चमन मेरी अमीरों का
जिगर का खून दे दे कर ये बूटे मैंने पाले हैं

रुलाती है मुझे रातों को खामुशी सितारों की
निराला इश्क है मेरा, निराले मेरे नाले हैं

न पूछो मुझ से लज्जत खानमां बर्बाद रहने की
नशेमन सैकड़ों मैंने बनाकर फूंक डाले हैं

नहीं बेगानगी अच्छी रफीके राहे मंजिल से
ठहर जा ऐ शरर हम भी तो आखिर मिटने वाले हैं

उम्मीदें हूर ने सब कुछ सिखा रखा है वाइज को
ये हजरत देखने में सीधे सादे भोले-भाले हैं

मिरे अशआर ऐ इकबाल क्यों प्यारे न हों मुझ को
मिरे टूटे हुए दिल के ये दर्द अंग्रेज नाले हैं


नया शिवाला
सच कह दूं ऐ बिरहमन! गर तू बुरा न माने
तेरे सनम कदों के बुत हो गए पुराने

अपनों से बैर रखना तूने बुतों से सीखा
जंगो जदल सिखाया वाइज को भी खुदा ने

तंग आ के मैंने आखिर दैरो हरम को छोड़ा
वाइज का वाज छोड़ा, छोड़े तिरे फसाने

पत्थर की मूरतों में समझा है तू खुदा है
खाके वतन का मुझको हर जर्रा देवता है

आ गैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें, नक्शे दूई मिटा दें
सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक नया शिवाला इस देश में बना दें
दुनिया के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ
दामाने आस्मां से इसका कलस मिला दें
हर सुब्ह उठ के गाएं मंतर वो मीठे मीठे
सारे पुजारियों को मय पीत की पिला दें
शक्ति भी शांति भी भगतों के गीत में है
धर्ती के बासियों की मुक्ति प्रीत में है


नानक
कौम ने पैगामे गौतम की जरा परवा न की
कद्र पहचानी न अपने गौहरे यक दाना की

आह! बदकिस्मत रहे आवाजे हक से बेखबर
गाफिल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर

आश्कारा इस ने किया जो जिन्दगी का राज था
हिंद को लेकिन ख्याली फलसफा पर नाज था

शम्मए हक से जो मुनव्वर हो ये वो महफिल न थी
बारिशे रहमत हुई, लेकिन जमीं काबिल न थी

आह! शूद्र के लिए हिंदोस्तां गम खाना है
दर्दे इंसानी से उस बस्ती का दिल बेगाना है

ब्रहमण सरशार है अब तक मए पिंडार में
शम्मए गौतम जल रही है महफिले अगियार में

बुतकदा फिर बाद मुद्दत के मगर रौशन हुआ
नूरे इब्राहीम से आजर का घर रौशन हुआ

फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से
हिंद को इक मर्दे कामिल ने जगाया ख्वाब से

तिरे इश्क की इंतिहा चाहता हूं
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूं

सितम कि हो वादए बेहिजाबी
कोई बात सब्र आजमा चाहता हूं

ये जन्नत मुबारक रहे जाहिदों को
कि मैं आपका सामना चाहता हूं

जरा सा तो दिल हूं, मगर शोख इतना
वही लंतरानी सुना चाहता हूं

कोई दम का मिहमां हूं ऐ अहले महफिल
चिरागे सहर हूं, बुझा चाहता हूं

भरी बज्म में राज की बात कह दी
बड़ा बेअदब हूं, सजा चाहता हूं

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